ग्‍यारहवें दिन की यात्रा - राक्षस ताल व मानसरोवर से साक्षातकार 29.07.2008

29.07.2008 श्रावण बदी 12 मंगलवार 
Photobucketआज 5.00 बजे सुबह उठकर तैयार हुए। 5.30 बजे नाश्ता के लिए डायनिंग हॉल गए। नाश्ते में टोस्ट, ब्रेड, जैम, फ्राई फल्लीदाना एवं चाय दिया गया। नाश्ता उपरांत गेस्ट हाऊस के कमरे से लगेज दो बार करके नीचे बस तक लाया। हल्की बूंदाबादी हो रही थी। लगेज बस में चढ़ाया गया पश्चात तालपत्री से ढ़का गया। 7.00 बजे (भारतीय समय) एक बस एवं एक लेण्ड क्रुजर में सवार होकर ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष के साथ यात्रा प्रारंभ हुई मैं बस में बैठा तकलाकोट शहर एवं उसके कुछ दूर तक डामर रोड मिला । पश्चात कच्चा उबड़-खाबड़ रास्ता प्रारंभ हो गया। निर्जन, वीरान एवं बंजर भूमि हल्की पहाड़ी तथा सपाट मैदान से होकर हमारी बस जा रही थी दूर-दूर तक हरियाली नजर नही आ रही थी। रोड का निर्माण कार्य प्रगति पर दिखा कही-कही डामरीकरण कार्य होते हुए दिखाई दिया, मजदूर ,बुलडोजर, ट्रेक्टर आदि काम पर दिखे। लगभग 9.00 बजे हमारी बस एवं जीप एक बड़ी सी झील के किनारे जाकर रूक गई जो कि हमारे बांयी ओर में आया। हम सभी यात्री नीचे उतरे, बस से नीचे उतरते ही तेज ठण्डी हवा महसूस किया गया।
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बस में हमारे साथ चीन सरकार की ओर से अधिकृत तिब्बत एवं इंग्लिश भाषा जानने वाला गाईड भी मुहैया कराया गया। उनके द्वारा इस झील का नाम राक्षसताल बताया गया मान्यता है कि रावण द्वारा इसी झील के किनारे बैठकर भगवान शिव की कठिन तपस्या किया गया है। इसलिए इस झील को ‘‘रावण ताल‘‘ या राक्षसताल भी कहते हैं झील से काफी दूर एक पहाड़ी बर्फ से ढ़का हुआ दिखाई दे रहा था उक्त हिमाच्छादित पर्वत को कैलाश पर्वत बताया गया। अब तक के यात्रा के दौरान कैलाश पर्वत के सर्वप्रथम दर्शन यहीं से हुआ। गुजरात निवासी कुछ यात्री श्री अशोक भाई के नेतृत्व में जाकर झील में स्नान भी किए। कुछ लोगों ने जल का स्पर्श किया तथा मेरे सहित कुछ लोग राक्षसताल के नजदीक भी नही गए। दिल्ली के यात्री श्री राकेश द्वारा बताया गया कि झील के बीच में स्थित टापू (द्वीप) में अभी भी कई लामा निवास करते है व साधना तथा तपस्या में लीन रहते हैं आधा घंटा रूकने के पश्चात हमारी बस राक्षसताल के किनारे-किनारे आगे बढ़ी कुछ दूर आगे जाने के बाद हमारी दाहिनी तरफ थोड़ी दूर मे बड़ा सा झील दिखाई दिया जिसे मानसरोवर झील बताया गया।

Photobucketहमारी बस आगे बढ़ती ही जा रही थी मानसरोवर लगातार दाहिनी तरफ दिखाई दे रहा था किन्तु आगे बांयी ओर दिखाई पड़ रहे राक्षसताल का दिखना बंद हो गया। मानसरोवर के पानी में सूरज की किरणे पड़ रही थी जिससे वह चमकीला दिखाई पड़ रहा था मानसरोवर के किनारे-किनारे दूर में हिमाच्छाादित लंबा पर्वत श्रृखंला लगातार दिखाई दे रहा था। दोनों झील के बारे में बताया गया कि मानसरोवर यदि सूर्य और प्रकाश है तो राक्षस ताल चन्द्रमा और रात का अंधेरा है। लगभग 10.30 बजे हमारी बस ‘‘कीहू‘‘ नामक स्थान पर यात्रियों के लिए बने गेस्ट हाऊस के पास ही रूकी। सामने मानसरोवर दिखाई दे रहा था। हमे सूचित किया गया कि ग्रुप ‘‘बी‘‘ के यात्री यही उतरेगें इसलिए वे अपना लगेज बस से उतार लेवे। चूंकि मैं ग्रुप ‘‘ए‘‘ में शामिल था, इसलिए सामान उतारने की आवश्यकता नही पड़ी, कुछ यात्री सामने मानसरोवर की ओर जा रहे थे मैं भी उन्ही के साथ वहां तक पहुंच गया एवं पहली बार मानसरोवर के पवित्र जल को स्पर्श किया एवं अपने ऊपर छिड़का पश्चात पुनः वापस बस के पास आ गया। तब तक यहां रूकने वाले यात्री अपना सामान उतार चूके थे। पहले मानसरोवर परिक्रमा करने वाले यात्रियों को ‘‘कीहू‘‘ में उतारकर ग्रुप ‘‘ए‘‘ के 23 यात्री पुन‘ बस में सवार हुए पश्चात आगे दरचन के लिए रवाना हुई।


तकलाकोट से ‘‘कीहू‘‘ की दूरी 98 कि.मी. है तथा यहां से दरचन की दूरी 42 कि.मी. है। जो समुद्र सतह से 5182 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। जहां पर हमारे ग्रुप के यात्रियों को उतरना है। दरचन के रास्ते में हिमालय में अनेक हिमाच्छिदत छोटे-छोटे पर्वत दिखाई दिए। लगभग 12.30 बजे हम लोग दरचन पहुंचे हमारी बस बांऊण्ड्रीवाल से घिरा हुआ भवन के पास जाकर रूकी कैलाश यात्रियों को इसी गेस्ट हाऊस में रूकवाया जाता है। बस के रूकते ही हम लोग अपना-अपना लगेज उतार कर गेस्ट हाऊस में दाखिल हुए। सभी कमरे में प्रायः 3-3 बेड लगे हुए थे। उसमें से एक कमरे में, मैं मस्करा व विक्रम रूके। सभी कमरे अटैच लेट-बाथ वाला था किन्तु बाथरूम में ताला लगा हुआ था पूछने पर बताया गया कि पानी नही होने से गंदा है, यात्रियों के लिए बाहर सार्वजनिक शौचालय की व्यवस्था है किन्तु वह भी फ्लैश युक्त नही होने के कारण काफी गंदा था। इतना गंदा शौचालय शायद मैं पहली बार देखा। अनुमान है कि जब से बना है, तब से गंदगी साफ ही नही किया गया है। हमारे साथ के यात्री दिल्ली के राकेश जुनेजा द्वारा बताया गया कि कुछ वर्ष पहले वे कैलाश यात्रा पर आए थे तो शौच हेतु बाहर मैदान में जाना पड़ता था। कमरे में सामान रख बाहर आए। पास ही पी.सी.ओ. देखकर घर बात किया अन्य यात्री भी वहीं पर से बात कर रहे थे।

हमारे साथ के महिला यात्रियों के द्वारा तकलाकोट से साथ लाए गए रसोईए के सहयोग से दोपहर के भोजन पकाने की तैयारी किचन में की जा रही थी। 1.30 बजे भोजन तैयार होने की सूचना पर भोजन हेतु गए। चांवल और सब्जी पकाया गया जिसे सभी भरपेट खाए। साय. 3.00 बजे दरचन के स्थानीय बाजार घुमने गए। प्रायः सभी दुकानों के मालिक तिब्बती महिला ही थी। खाने-पीने के सामान के अलावा अन्य सभी सामानों के भाव में मोल-तोल बहुत किया जा रहा था। आसमान से कोहरा छटने पर दूर पहाड़ों के बीच में शाम को लगभग 5.00 बजे गेस्ट हाऊस से कैलाश पर्वत के दर्शन हुए।

कैलाश परिक्रमा की कुल दूरी 48 कि.मी. है जिसमे तीन दिन और दो रात गुजारकर पुनः इस गेस्ट हाऊस में आना है इसलिए परिक्रमा के दौरान तीन दिन के लिए पृथक से सामान का बैग तैयार कर शेष लगेज गेस्ट हाऊस में छोड़े जाने का निर्देश होने पर सभी यात्री तद्नुसार अपना-अपना सामान लगेज तैयार किए। रात के खाने में आज महिला सहयात्रियों के द्वारा खिचड़ी बनाया गया। अचार-पापड़ के साथ खिचड़ी का आनन्द सभी यात्री डिनर में लिए। प्रकाश व्यवस्था यहां भी जनरेटर से की जा रही थी इसलिए सभी यात्री जल्दी अपने-अपने कमरें में जाकर सो गए।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर

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