तेरहवें दिन की यात्रा शिव स्थल,गौरीकुण्ड और जेंगजेरबू 31.07.2008

31.07.2008 श्रावण बदी 14 गुरूवार

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रात को पानी गिरने से बाहर जगह-जगह बर्फ जम गया, ठण्डी बढ़ गई। सुबह 5.30 बजे सोकर उठा, गुनगुने पानी से ब्रश किया गया। टेण्ट में जाकर चाय पिया फिर आगे की यात्रा के लिए तैयार हुआ, अन्य यात्री भी तैयार हो गए। सुबह 7.00 बजे यात्रा में रवाना होने के पूर्व कैम्प के बाहर से कैलाश के पुनः दर्शन किए। सूर्योदय हो रहा था इस वजह से सूर्य प्रकाश कैलाश के हिमाच्छादित शिखर पर पड़ रहा था जिससे कैलाश शिखर स्वर्ण मंडित जैसे दिखाई दे रहा था। ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ उद्घोष के बाद पैदल यात्रा शुरू किया, घोडे़ वाले को आगे जाकर रूकने को कहा। थोड़ी दूर ही पैदल चलने पर सांस फुलने लग गया चूंकि आगे लगभग 5 कि.मी. खड़ी, संकरी, पथरीली चढ़ाई थी, इसलिए घोड़े से आगे यात्रा प्रारंभ किया। रास्ते में चारो तरफ सिर्फ चट्टान ही चट्टान एवं उसके ऊपर बर्फ के परत दिखाई दे रहा था, पेड़ पौधे एवं हरियाली के नामो निशान नहीं है।
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लगभग 9.30 बजे हम लोग डोल्पा पास पहुंचे जिसकी समुद्र सतह से ऊचाई 18600 फीट हैं इस स्थल को तिब्बती देवता डोमा के नाम से डोल्मा माता का स्थान भी कहते है। यहां सभी यात्री पूजा करते है। रोली, मेंहदी, हल्दी चढ़ाकर एवं कपूर बत्ती, अगरबत्ती जलाकर मैं भी पूजा किया। पूजा स्थल पर बर्फ जमा हुआ है। पास ही ‘‘शिव स्थल‘‘ है वह भी बर्फ से ढंका हुआ है यहां यात्रीगण पुराने कपड़े छोड़ते है अर्थात मुनष्य वर्तमान धारण किए शरीर को छोड़कर नवीन शरीर धारण करता है। यह भी बताया गया कि ‘‘शिव स्थल‘‘ में मृत्यु के देवता यम द्वारा आपका परीक्षा लिया जाता है। आज मौसम साफ है, हल्की धूप निकली हुई है, ठण्ड में धूप अच्छा लग रहा है । यह स्थान समुद्र सतह से काफी ऊंचा है, तेज ठण्डी हवा है व साथ ही बर्फ भी जमा हुआ है, आक्सीजन कम हैं यहां मौसम कभी भी खराब हो जाता है। इसलिए यहां यात्रियों को अधिक समय तक रूकने की सलाह नही दी जाती।
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मैं भी ‘‘डोल्मा माता‘‘ के पूजा कर ‘‘शिवस्थल‘‘ को प्रणाम किया, थोड़ी देर रूककर आगे बढ़ गया। डोल्मा पास के नजदीक के चट्टान को बताया गया कि यह ‘‘भगवती‘‘ तारा देवी की प्रतीक है। डोल्मा से आगे केवल बोल्डर व चट्टानयुक्त पगडण्डी है, पैदल ही चढ़ाई से उतरना है, इसलिए घोड़े वाला आगे बढ़ गया है मैं पोर्टर के साथ धीरे-धीरे छड़ी के सहारे से आगे बढ़ने लगा। थोड़ी ही दूर चलने के बाद पहाड़ी के नीचे घाटी में आपस में मिले हुए दो छोटे-छोटे तालाब जैसे दिखाई दिया, जिसमें का पानी हरें रंग का दिखाई दे रहा है जिसके बारे में बताया गया कि यह ‘‘गौरीकुण्ड‘‘ है मान्यता है कि इसमें भगवती मां पार्वती स्नान करती है। गौरी कुण्ड से जल ले जाने के लिए बाटल मैं अपने साथ में ही लाया था जिसे बैग से निकालकर पोर्टर को दिया और उसे नीचे जाकर ‘‘गौरी कुण्ड‘‘ से जल लाने के लिए भेजा। क्योकि यात्रियों को जल लाने हेतु नीचे खतरनाक फिसलन होने से जाने की सलाह नहीं दी जाती फिर भी कुछ यात्री स्वयं जल लाने नीचे गौरी कुण्ड जा रहे थे तथा कुछ यात्री भी अपने-अपने पोर्टर को जल लाने भेज रहे थे। मेरे पोर्टर द्वारा नीचे जाने एवं जल लेकर ऊपर आते तक मैं इंतजार करते रहा। पोर्टर द्वारा जल लेकर आने के बाद पुनः उसे बैग सौंपकर पहाड़ी से नीचे उतरना प्रारंभ किया, धूप काफी तेज हो गई थी रास्ते में बोल्डर जैसे पत्थर, चट्टान होने तथा ढलान होने से बहुत धीरे-धीरे ही उतर रहे थे, इसके बावजूद भी थोड़ी देर मे थकान हो जाती थी।
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उतरते समय कुछ दूर बर्फीले रास्ते को भी पार करना पड़ा जिसमें कुछ ज्यादा ही सावधानी की जरूरत थी पोर्टर के द्वारा बताया गया कि पहले छड़ी से आगे बर्फ में ठोस स्थान देखलें उसके बाद ही आगे कदम बढ़ाए अथवा पूर्व से पार किए गए यात्री के द्वारा छोड़े गए पैर के निशान के ऊपर कदम रखकर बर्फीली रास्ता पार करे, तद्नुसार ही मैं आगे बढ़ा। लगभग 1.30 बजे मैं पहाड़ी से नीचे उतरकर घाटी में पहुंचा जहां पर नदी बह रही थी घोड़े घास चर रहे थे व घोड़े वाले हमारा इंतजार कर रहे थे वहां पर एक दो झोपड़ी में बनाकर होटल भी चलाया जा रहा था जहां पहुंचकर यात्री, पोनी, पोर्टर, जलपान कर रहे थे। मैं भी वहां रूककर थोड़ी देर विश्राम किया। क्रमशः सभी यात्री यहां पर पहंुचकर थोड़ा जलपान एवं विश्राम अवश्य किए। थोड़ी दूर रूकने के बाद पुनः सभी यात्री यात्रा प्रारंभ किए। दिल्ली के यात्री श्री विक्रम नदी जहां पर संकरा व उथला था वहां से नदी के उस पार जाकर किनारे-किनारे यात्रा कर रहे थे। पहाड़ी उतार-चढ़ाव वाले रास्ते के कारण सभी यात्री अत्यन्त थक गए थे इसलिए जिन यात्रियों ने पोनी की सुविधा लिए थे वे सभी तत्काल घोडे़ के द्वारा यात्रा करना प्रारंभ किए।
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जैसे-जैसे हमारी यात्रा आगे ‘‘जेगेंजरबू‘‘ की ओर बढ़ती जा रही थी वैसे-वैसे नदी चैड़ी और गहरी होती जा रही थी विक्रम को उस तरफ से इस तरफ आने का उपयुक्त स्थान ही नही दिख रहा था, जेगेंजरबू पहुंचने से लगभग 1 कि.मी. पहले ही उसे नदी के उस तरफ रूकने का इशारा कर मेरे घोड़े वाले पोनी को एक अन्य यात्री के अतिरिक्त घोड़ा उस तक भेजकर उसे इस तरफ लाने के लिए भेजा गयां मेरा पोनी नीचे जाकर घोड़े से नदी पारकर दूसरे घोड़े से विक्रम को बिठाकर नदी पार कराकर हम लोग जहां पर रूके थे वहां पर लाया उसके बाद हम लोग जेंगजेरबू के लिए रवाना हुए । डेरापुक से जेगनेजराबू की दूरी 19 कि.मी है तथा समुद्र सतह से 4790 फीट ऊचाई पर है। सायं 4.00 बजे हम कुछ यात्री ‘‘जेंगजेरबू‘‘ पहुंचे एवं कैम्प के कमरे में अपना-अपना स्थान सुरक्षित किए। एक कमरे में मैं राजनारायण, जुनेजा, रामशरण और बालकिशन रूके। कैम्प के पास से पहाड़ी झरना बहकर नीचे नदी मे जाकर मिल रही थी उसी झरने में हाथ मुंह धोकर फ्रेश हुए, फिर चाय पिए। आज रात को खाने में खिचड़ी बना, दिनभर से आज कोई यात्री खाना नही खाए थे सभी यात्री खिचड़ी, अचार और पापड़ खाए। प्रकाश व्यवस्था यहां भी जनरेटर से किया गया जो कि रात 9.30 बजे तक ही उपलब्ध हुआ। थकावट अधिक थी इसलिए जल्दी सो गए।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर

4 comments:

  1. U r doing a great service to the cause of religion and tourism both. my heartfelt best wishes !

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  2. जमे रहिये अच्छी यात्रा चल रहिये।

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  3. बेहतरीन रचना बन पड़ा हैआपका यह लेख... साधुवाद!

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  4. बेहतरीन रचना बन पड़ा हैआपका यह लेख... साधुवाद!

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