तीसरे दिन की यात्रा 21.07.2008 श्रावण बदी 3 सोमवार

प्रातः 2.00 बजे चाय वालो ने आकर जगा दिया। चाय पीकर सभी यात्री नित्यक्रिया में व्यस्त हो गए। मैंने स्नान किया, आगे के रास्ते के अनुकूल कपड़ा पहन तैयार होकर डायनिंग हाॅल मे आकर बोर्नविटा पिया। उसके पश्चात 2.45 बजे बस में आकर बैठ गया। 3.00 बजे तक सभी यात्री बस में आ गए। ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष के बाद हमारी बस रवाना हो गई । आज हमें बस द्वारा मंगती तक ही जाना है, उसके बाद पैदल यात्रा शुरू होनी है। धारचुला से तवाघाट होकर मंगती की दूरी लगभग 35 किमी है जिसे लगभग दो घंटे में बस द्वारा पूरी करनी है। बस चलने के कुछ देर बाद झपकी आ गई। जब आंख खुली तो पाया बस रूकी हुई है सहयात्री नीचे उतर रहे है। बस रूकने का कारण पता चला कि मार्ग अवरूद्ध हो गया है, रात में पानी गिरने के वजह से पहाड़ से चट्टान खिसककर सड़क पर आ गयी है। पहाड़ी रास्ता होने के वजह से बरसात के दिनों में यहां यह आम बात है। सभी यात्री नीचे उतरकर अवरूद्ध मार्ग को देखने लगे। हम लोग धारचूला से लगभग 10-12   कि.मी. ही आगे आ पाए है। सुबह हो गई थी हल्की बारिश हो रही थी, शहर से बुलडोजर एवं जेसीबी बुला कर रास्ता साफ करने का कार्य प्रारंभ किया गया। किन्तु पहाड़ से मलमा सहित बड़ी-बड़ी चट्टाने गिरी थी, अतः काफी प्रयास के बाद भी रास्ता साफ नहीं किया जा सका। चूंकि सुबह हो गई थी, इसलिए स्थानीय लोगों ने पहाड़ी के रास्ते पैदल आना जाना प्रारंभ कर दिया था। कल हम लोगों के द्वारा मांगे गए अनुरूप पोर्टर भी वहां पहुंच गए। सभी को अपने-अपने लिए निर्धारित पोर्टर से मिलाया गया। लगभग 8.30 बजे तय हुआ कि रास्ता साफ नही हो सकेगा अतः जिस रास्ते से स्थानीय लोग आना-जाना कर रहे है उसी रास्ते से पहाड़ पर चढ़ कर इस अवरूद्ध मार्ग को पार किया जाए एवं उस पार से टैक्सी की व्यवस्था कुमाऊ मण्डल विकास निगम के द्वारा की गई है  जिससे आगे मंगती तक पहुंच सकेगें। सभी यात्रियों ने पहाड़ी चढ़ना प्रारंभ किया। मेरा पोर्टर श्री राजेश भी उक्त स्थल पर पहंुच गया था जिसे मैंने अपना बैग सौंप दिया एवं उसे आगे-आगे चलने हेतु कहकर उसके पीछे मैं भी पहाड़ में चढ़ने लगा। पानी गिरने के बाद पहाड़ी पगडंडी रास्ते में चढ़ते हुए काफी सावधानी से यात्रीगण आगे बढ़ते गए। चढ़ाई समाप्त करके हम लोग पुनः उतरते हुए उसी सड़क पर आ गए। थोड़ी दूर सड़क में पैदल चलने के बाद टैक्सी मिल गई जिस पर 12-15 यात्रियों ने ठसाठस बैठकर मंगती की ओर प्रस्थान किया। सड़क मार्ग से टैक्सी द्वारा मंगती की ओर बमुश्किल 5-6 कि.मी. जा पाए थे कि पुनः चट्टान गिरने से मार्ग अवरूद्ध हो गया। टैक्सी से उतर कर पैदल ही अवरूद्ध मार्ग को पार करते हुए आगे बढ़े। कुछ दूर चले ही थे कि मंगती से टैक्सी सवारी लेकर आई चूंकि मार्ग अवरूद्ध था इसलिए उसमें आई सवारियां भी उतर गई तब उसी खाली हुई टैक्सी के द्वारा हम लोग लगभग दोपहर 12.30 बजे मंगती पहुंचे। पानी गिरना प्रारंभ हो गया था। हमारे कुछ यात्री पीछे रह गए थे रास्ता दो जगह बंद हो गया है। इसलिए उन्होंनेे पूरे रास्ते को पहाड़ी पगडंडी के द्वारा तय करते हुए मंगती के लिए प्रस्थान किया। मंगती के टैक्सी स्टैण्डनुमा स्थान पर एक दो झोपड़ी में होटल खुले हुए थे जहां हम यात्रियों को बैठाकर खिचड़ी खिलाने की व्यवस्था की गई थी। पानी का गिरना जारी था इसलिए पैदल आने वाले यात्रियों को विलम्ब हो रहा था। यही से हमे पोनी (घोड़े वाले) की सुविधाएं मिलनी थी, इसलिए मांग अनुरूप घोड़े वाले उपस्थित थे। सभी यात्रियों ने मंगती पहुंचने के पश्चात अगले पड़ाव ‘‘गाला‘‘ के लिए पैदल एवं घोड़े के द्वारा यात्रा दोपहर 2.30 बजे प्रारंभ की।

मंगती से गाला के रास्ता पहाड़ी एवं चढ़ाई वाला है, पानी भी लगातार गिर रहा था, चट्टानें भी अचानक गिर रही थी, इसलिए यह यात्रा अत्यन्त कठिन हो गयी थी। मेरा पोर्टर मेरे लिए नियत किए गए घोड़े वाले को लेकर आया, तब तक मैंने रेनकोट पहन लिया एवं पास ही स्थित बड़े पत्थर के सहारे से घोड़े पर बैठ गया। धीरे-धीरे हम सभी यात्रियों ने पैदल/घोड़े के द्वारा यात्रा प्रारंभ की। तेज बारिश की वजह से मुझे रेनकोट पहनने के बाद भी पानी से कपड़े एवं जूते-मोजे भीग जाने का एहसास हो रहा था। रास्ते में कुछ जगह घोड़े के द्वारा जाना संभव नहीं था। वहां पर से पैदल यात्रा करना पड़ा, यद्यपि मंगती से गाला की दूरी मात्र 3 कि.मी. ही है किन्तु पानी गिरने के वजह से हम धीरे-धीरे चल रहे थे। गाला कैम्प पहुंचने के 1/2 कि.मी. आईटीबीपी के जवान ने रास्ते के एक हट्स में आलू चिप्स और गरमा-गरम चाय लेकर हम यात्रियों का स्वागत कर रहे थे। सभी यात्री उनके स्वागत से अभीभूत होकर चाय पीकर कैम्प की ओर बढ़े एवं 6.00 बजे गाला पहुंचे। यात्रियों के लिए निर्धारित रूकने के स्थान में पहले आओ पहले पाओ के अनुसार यात्रीगण अपना-अपना स्थान सुनिश्चित कर रहे थे। जिस बैग को पोर्टर को पकड़वाया था उसे वापस लेकर मैं भी ठहर गया। बैग के सभी समान एवं कपड़े आदि गीले हो गए थे। पहना हुआ कपड़ा जूता-मोजा भी पूरी तरह से भीग गया था इसलिए ठण्ड लग रही थी, गीले कपड़े एवं जूता मोजा निकालकर बिस्तर में दुबकना ही उचित मानकर मैं बिस्तर में लेट गया। जिस ह्टस में मैं रूका था उसमें 6 यात्रियों के लायक लकड़ी के तखत एवं गद्दे लगे हुए थे। मेरे बायीं तरफ दिल्ली के श्री गुप्ताजी एवं दाहिने तरफ बंैगलोर के श्री बालाजी लेटे हुए थे। थोडी देर के बाद गरमा-गरम सूप हमारे पास आ गया सूप पीने के बाद थोड़ी गरमी महसूस हुई। रात्रि 7.30 बजे जनरेटर चालू किया गया जिससे एक बल्ब द्वारा हमारे ह्टस में प्रकाश फैल गया। ठीक 8.00 बजे डिनर के लिए बुलाया गया। एक-एक कर हम सभी यात्री डिनर हाॅल में उपस्थित हुए। भोजन करते-करते अपनी-अपनी आज की यात्रा का अनुभव एक दूसरे को बताने लगे। लाईजिंग आफिसर श्री हरन द्वारा हम सबको जानकारी दी गई है कि कल की यात्रा 18 कि.मी. की है जो काफी कठिन एवं चढ़ाई वाली है इसलिए यात्रा प्रातः 5.00 बजे प्रारंभ होगी। भोजन के बाद सभी यात्री शयन के लिए चले गए।  9.30 बजे के बाद जनरेटर बंद होने से लाईट भी बंद हो गयी। तब तक हम सो चूके थे। 
 क्रमश: .....

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