चौंथे दिन की यात्रा - 22.07.2008

22.07.2008 श्रावण बदी 4 मंगलवार

Photobucketसुबह 4.00 बजे नींद खुल गई। नित्यक्रिया से निवृत हो पहले बैग तैयार किया, आज स्नान नहीं किया। कल जो कपड़े गीले हुए थे पूर्णतया नहीं सुख पाए। सभी यात्री डायनिंग हाल में जाकर नाश्ता किया एवं बोर्नविटा पिया। ठीक 5.00 बजे यात्रा पर रवाना हुए। आज की यात्रा कुल 18 कि.मी. की हैं किन्तु उसमे से 7-8 कि.मी. लखनपुर अत्यन्त कठिन सकरा एवं पथरीला रास्ता है। मौसम साफ है हल्की-हल्की धूप है इसीलिए कल के मुकाबले आज आनन्द आ रहा है। कुछ दूर पैदल चलने के बाद घोड़े पर बैठकर यात्रा की। पूरा रास्ता काली नदी के किनारे-किनारे जाता है। काली नदी के एक तरफ भारत है एवं दूसरी तरफ नेपाल है। लगभग 8.30-9.00 बजे हम लोग लखनपुर पहुंचे, वहां चाय की व्यवस्था की गई थी। सभी यात्री चाय पीकर पुनः रवाना हुए।

Photobucketअत्यन्त सकरा चट्टानी रास्ता, दाहिने तरफ 300-400 फीट नीचे काली नदी अत्यन्त वेग से बह रही थी। एवं बायी तरफ पत्थर का पहाड़ जिसके ऊपर से बीच-बीच में झरना बह रहा था। चूंकि झरने के नीचे से गुजरना ही पड़ रहा था इसलिए मैंने रेनकोट पहन लिया था। कहीं-कहीं पर ढ़ाल एवं सकरा पथरीला रास्ता के वजह से घोड़े से उतरकर पैदल भी चलना पड़ा जिसके वजह से कुछ थकान भी महसूस किया। लगभग 11.30 बजे हम लोग माल्पा पहुचे, जिसके बारे में बताया गया कि 1998 के पूर्व तक यात्री यही पर रात्रि विश्राम करते थे किंतु 1998 में रात्रि के वक्त पहाड़ धसकने से यात्रियों सहित 200-300 लोग काल-कवलित हो गए, तब से यहां से कैम्प हटा दिया गया है। रास्ते मे ही 1998 के दुर्घटना में मृत लोगों के (यात्री जवान अन्य) याद में ‘‘स्मृति स्‍तंभ‘‘ बनाया गया है। जिसमे म.प्र. के पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह के द्वारा निर्माण कार्य में सहयोग करना भी उल्लेखित है।

Photobucketघटना स्थल के थोड़ा आगे चलने पर मैदान जैसा स्थान है। यही पर कुमाऊ मण्डल विकास निगम के द्वारा यात्रियों के दोपहर भोजन की व्यवस्था की गई है। क्रमशः यात्रीगण आते जा रहे थे और भोजन ग्रहण कर रहे थे। (पुड़ी, छोले, चांवल) मैने भी थोड़ा भोजन किया धूप तेज हो गई थी इसीलिए कल के गीले कपड़े, बैग तथा रास्ते के झरने में गीले हुए जूते एवं मोजा को सूखने के लिए फैला दिया तथा पोनी एवं पोर्टर को भी कुछ खाने के लिए सामान एवं रूपये दिए। आधा घंटा तक रूकने पर सभी गीले कपड़े, मोजे आदि सुख गए। पुनः चलने की तैयारी कर पोर्टर से रास्ते के लिये एक बाटल पेप्सी पेय मंगाया। यहां से रवाना होने के पूर्व 15-20 यात्री मेरे से आगे रवाना हो चूंके थे। कुछ अभी तक यहां पहुंच ही रहे थे। फिर भी हम लोग धीरे-धीरे आगे रवाना हो गए। कुछ दूर चलने के बाद घोड़े के द्वारा आगे यात्रा जारी रखी।

Photobucketआगे का रास्ता पीछे के रास्ते के मुकाबले अपेक्षाकृत आसान था किन्तु काली नदी घाटी में तेजी से पूर्ववत बह रही थी। लगभग 3.00 बजे मैं लामरी पहुंचा। यहां पर इण्डो-तिब्बत बार्डर पुलिस के कैम्प में यात्रियों के लिए बिस्किट, आलू, चिप्स व चाय की व्यवस्था की गई थी । जवानों के द्वारा ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ बोलकर यात्रियों का स्वागत करते हुए उन्हें बिठाया जा रहा था एवं चाय प्रस्तुत की जा रही थी। मेरे से पूर्व श्री हरन पहुंच कर चाय पी रहे थे। मैंने भी चिप्स एवं चाय ली। तब तक पूणे के यात्री श्री अड्रर एवं सुश्री पूजा साठे भी पहुंचे। उन्होंने भी चाय ली। चाय पीने के उपरान्त हम सबने एक साथ यात्रा प्रारंभ की। लामरी कैम्प के आखरी छोर में चार छैः झोपड़ीनुमा मकान थे जहां पर पोनी पोर्टर चाय पी रहे थे। वहीं पर आडू के पेड़ भी दिखे जिसमें बहुत फल लगे हुए थे। लामरी से आगे के रास्ते में बहुत ही खूबसूरत झरने भारत तथा नेपाल दोनो तरफ देखने को मिले । कुछ दूर चलने के बाद पोनी को याद आया कि वह अपना बैग लामरी चाय दुकान में भूल गया है। जिसे वह लेने वापस गया। तब तक पोनी का काम पोर्टर राजेश ही करने लगा, कुछ दूर मे अकेले बिना पोनी के व पोर्टर के अकेले ही घोड़े में गया।

Photobucketरास्ता पथरीला सकरा एवं घाटी होने से बहुत डर भी लग रहा था लेकिन शाम होने के पहले बुधी कैम्प पहुंचना भी था इसलिए हम लोग आगे बढ़ते ही गए। कुछ देर बाद पोनी अपना बैग लामरी से लेकर भागते हुए आते दिखा तो अच्छा लगा। आगे रास्ते मे तेज बहाव वाला झरना मिला जिसमें बीच-बीच मे बेढ़ंगे पत्थर थे तथा नीचे गहरी खाई में काली नदी बह रही थी, झरने का पानी इसी नदी में गिरता है। उक्त झरने को पार करते समय घोड़ा वाला मुझे घोड़े से उतारकर पोर्टर के अनुसार चलने को कहा मैं पोर्टर का अनुसरण करते हुए पत्थरों में पाव रखकर चलते, कूदते हुए झरना पार कर घोड़े का इंतजार करने लगा। एक यात्री पूजा साठे को घोड़े से बिना उतारे ही उक्त झरना पार करते देख रहा था, झरने के बीच में पहुंच कर उक्त यात्री का घोड़ा पत्थर में पैर फिसलने के वजह से डगमगाकर बड़ी मुश्किल से संभला जिससे अनहोनी घटना होते-होते बची। इस घटना से उक्त यात्री एवं मेरे सहित वहां उपस्थित यात्री काफी सहम गए।

PhotobucketPhotobucketPhotobucketथोड़ी देर बाद हम पुनः यात्रा प्रारंभ की। लगभग सायं 5.00 बजे हम पुल पार कर एक दम खड़ी चढ़ाई पार कर बुधी पहुंचे। बुधी छोटा सा पहाड़ी गांव है। गांव के पास ही कुमाऊ मंडल विकास निगम का कैम्प है। कैम्प के पूर्व पोनी को छोड़कर पोर्टर सहित कैम्प में दाखिल हुआ। पोर्टर से बैग लेकर उसे खाने के लिए पैसा दिया एवं कैम्प में मैं अंदर गया। कैम्प पहुंचते ही ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के घोष के साथ स्वागत किया गया एवं पीने को एक गिलास रसना दिया गया। रसना पीकर मैं टेंट मे दाखिल हुआ। यहां भी लकड़ी के तखत में गद्दे लगे हुए थे यहां मैंने अपना स्थान सुरक्षित कर हाथ मूंह धोया और थोड़ा लेट गया बाहर तेज ठण्डी हवा चल रही थी इसलिए सभी यात्री पहुंचते ही बिस्तर में लेटने का उपक्रम कर रहे थे । घर फोन से बात करना चाहा लेकिन बताया गया कि बैटरी चार्ज नहीं होने से सेटेलाईट से बात नही हो पा रही है। ठीक सात बजे सूप आ गया एवं जनरेटर के द्वारा लाईट भी चालू हो गया। सभी यात्री सूप लेकर एक दूसरे का हाल चाल पूछते हुए इधर-उधर टहलते रहे ठण्डी हवा तेज चल रही थी इसलिए यह क्रम ज्यादा नहीं चला सभी पुनः अपने-अपने बिस्तर में चले गए । रात्रि 8.00 बजे डिनर का बुलावा आया, सभी यात्रियों ने डिनर  हाल मे उपस्थित होकर चर्चा करते हुए भोजन ग्रहण किया। कल की यात्रा के सम्बन्ध में भी चर्चा हुई एवं कल प्रातः 5.00 बजे से रवाना होने का निर्णय हुआ। सभी 9.00 बजे के पूर्व अपने-अपने बिस्तर पर लेट गए। आधा घंटा बाद जनरेटर बंद हो गया।



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क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी, 
रायपुर

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