पांचवें दिन की यात्रा - 23.07.2008

23.07.2008 श्रावण बदी 5 बुधवार
Photobucketविगत दिनों की तरह सुबह 4.00 बजे नींद खुल गई। चाय पीकर नित्यक्रिया से निवृत हो यात्रा में प्रस्थान के लिए तैयार हुआ। आज भी स्नान नहीं किया। डायनिंग हॉल में सभी यात्री धीरे-धीरे एकत्र हो गए। सभी को बोर्नविटा सर्व किया गया। सुबह-सुबह तेज ठण्डी हवा चल रही थी, लगभग 5.00 बजे ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ का उद्घोष कर सबने आगे की यात्रा के लिए प्रस्थान किया। उस समय सभी यात्रियों के पोर्टर भी आ गए थे, उन्हे अपना-अपना बैग सौंपकर पैदल उनके साथ रवाना हुए। पहाड़ी गांव बुधी के सीमा के बाहर घोड़े वाले भी इंतजार करते खड़े थे। जिन यात्री के द्वारा घोड़े किराये पर लिया गया था, वे अपने-अपने घोड़े पर सवार होकर आगे बढ़े जिसमें मैं भी शामिल था। यात्रा में सामने पहाड़ी में खड़ी चढ़ाई चढ़नी है, लगभग 5 कि.मी. खड़ी चढ़ाई के बाद छियालेख घाटी पहुंचे। पथरीली सीढ़ीदार चढ़ाई काफी जोखिम एवं थकाने वाली थी, प्रायः सभी यात्री धीरे-धीरे उस चढ़ाई को चढ़ रहे थे। घोड़े के द्वारा चढ़ाई करने पर भी उक्त पहाड़ी की चढ़ाई काफी थका देने वाली रही।
Photobucketखड़ी चढ़ाई समाप्त होने पर हम लोग छिया लेख के समतल घाटी में पहुच गए जहां पर इण्डो-तिब्बत बार्डर पुलिस (आईटीबीपी) के द्वारा चाय एवं नाश्ता का इंतजाम किया गया था। नाश्ता करते हुए हम लोगों ने अपनी थकान कम की एवं पुनः रवाना हुए। घाटी में आगे चेक पोस्ट था जहां पर हम लोगों का पासपोर्ट तथा पोनी पोर्टर का अनुमति पत्र चेक किया गया। छियालेख घाटी में विभिन्न रंगों के फुल यत्र-तत्र खिले हुए थे व पहाड़ों में बर्फ दिखाई दी कोहरा भी काफी था। जिसे निहारते हुए कुछ दूर पैदल भी यात्रा की  उसके पश्चात पुनः घोड़े से सफर किया। यात्रा के दौरान रास्ते में पहाड़ी गांव ‘‘गर्बियांग‘‘ आया जहां के घरों के दरवाजे नक्काशीदार देखने को मिले। बताया गया कि इस गांव से काफी लोग बाहर जाकर पढ़े लिखे हैं जिसमें से कुछ लोग भारतीय प्रशासकीय सेवा में भी है।Photobucketगार्बियांग बस्ती के बीच से रास्ता जाता है। जहां पर एक छोटा होटल भी है। वहां पर पोरबंदर के श्री अशोक भाई अपने पोर्टर के साथ मेरे से पहले पहुंच चुके थे वे सभी को समोसा का नाश्ता करवा रहे थे।श्री अशोक भाई की यह कैलाश मानसरोवर की आठवीं यात्रा है । वे इस यात्रा को पैदल चलकर ही पूरा कर रहे थे। गार्बियांग के इस होटल में विगत वर्षो के हर यात्रा के दौरान वे आते रहे है। जिससे वे एक दूसरे को पहचान रहे थे। थोड़ी देर रूकने के बाद मैं आगे बढ़ गया। गांव के बाहर आईटीबीपी कैम्प हैं जहां सभी यात्री पहुंच कर अपना-अपना पासपोर्ट पुनः चेक करवा रहे थे। मैं भी वहां पहुंचकर अपना पासपोर्ट पुनः चेक करवाकर इन्ट्री कराया। इसी समय कैलाश मानसरोवर परिक्रमा पूर्ण कर यात्रियों का दल (समुह क्र. 5) वापस वही पर आकर अपना-अपना पासपोर्ट चेक करवा रहे थे। उनसे यात्रा, कठिनाई, मौसम, स्वास्थ्य के बारे में हमारे समुह के यात्रीगण पूछताछ कर रहे थे। वापस आने वाले यात्रीगण हमसे पूछ रहे थे। कि हम लोग किस शहर से है आदि की जानकारी ले रहे थे। एक ही प्रदेश के यात्री मिल जाने पर खुश हो रहे थे।

मेरे द्वारा छत्तीसगढ़ से आने की जानकारी दिए जाने पर मुझे बताया गया कि उनके बैच में भी छत्तीसगढ़ के यात्री शामिल है जो आगे रास्ते में आपको मिल जाएंगें। आईटीबीपी कैम्प से आगे बढ़ने पर रास्ते में और वापस होने वाले यात्री मिले जिनमे (बिलासपुर) छत्तीसगढ़ से 4 यात्री मिले उनसे चर्चा कर मुझे प्रसन्नता हुई। लगभग 11.00 बजे हम लोग एक समतल मैदान पर पहुंचे जहां पर झोपड़ी नुमा एक होटल में दोपहर भोजन की व्यवस्था थी। सभी यात्री वहां पहुंचकर भोजन करते जा रहे थे। भोजन में खिचड़ी, सब्जी, चटनी, रोटी दी गयी मैंने भी भोजन किया जो कि बहुत ही सुस्वादु लगा। भोजन करने के बाद यात्री क्रमशः रवाना हो रहे थे। मैं भी रवाना हो गया।
Photobucketलगभग दोपहर 1.00 बजे गुंजी कैम्प के पूर्व टिंकर व काली नदी के संगम के पास वाले स्थान पर पहुंचा। कुछ यात्री वहां पहुंचकर चाय पी रहे थे। नदी के उस पार आईटीबीपी के बेस कैम्प गुंजी स्पष्ट दिखाई दे रहा था। हम चाय पीकर पैदल ही कैम्प की ओर रवाना हुए। टिंकर नदी में लकड़ी के बने पुल को पार कर ग्राम गुंजी पंहुचे, गुंजी के बस्ती के अंदर से होकर कैम्प जाने का रास्ता है जिससे गुजर कर सभी यात्री कैम्प की ओर जा रहे थे। गांव से कुछ दूर पर पहाड़ के नीचे समतल मैदान में आईटीबीपी के कैम्प है। कैम्प के बाजू में ही कुमाऊ मण्डल विकास निगम के द्वारा यात्रियों के लिए लोहे के डोम (गोलाकार) रूकने के लिए बनवाया गया है। जहां सभी यात्री क्रमशः पहुंच रहे थे। लगभग 2.00 बजे में भी उक्त कैम्प में पहुंचा। पोर्टर से बैग लेकर पोनी एवं पोर्टर दोनों को रवाना किया। इन लोगों को कुछ दूर पर स्थित होटल के पास रूकने की जानकारी दी। जिस कक्ष में मैं रूका उसमें कुल 10 यात्रियों के लिए गद्दे बिस्तर लगे हुए थे जिसमें एक लाईन में श्री राजनारानारायण मस्करा-अहमदाबाद, फिर मैं, फिर राकेश तनेजा-दिल्ली, फिर विक्रम- दिल्ली, रूके। दूसरे लाईन में 6 अन्य यात्री रूके।

कैम्प पहुंचते ही रसना दिया गया। नहाने के लिए कुछ यात्री ईंट के चूल्हे बनाकर पानी गरम कर रहे थे। धारचुला के बाद से मैं भी गाला, बुधी में स्नान नहीं किया था इसलिए नहाना चाह रहा था किन्तु गरम पानी मिलने में देरी को देखते हुए ठण्डे पानी से ही नहाया। कैम्प में पानी पहाड़ से बर्फं पिघलकर जो झरना बह रहा था वहां पर से पाईप लगाकर आपूर्ति की जा रही थी। पानी बहुत ठण्डा था लेकिन धूप भी तेज थी इसलिए नहाने के बाद बहुत अच्छा लगा। लगभग   4.00 बजे यात्रियों का लगेज जिसे हम लोग दो दिन पूर्व धारचुला में छोड़कर आए थे। खच्चर में लादकर कुमाऊ मण्डल विकास निगम के द्वारा कैम्प में पहुचाया गया। पोर्टर ने मेरा लगेज पहचान कर मैं जहां रूका था वहां लाकर छोड़ दिया। शाम तक कुछ यात्रियों के लगेज नहीं आने पर कल पहुंचने की जानकारी दी गई ।

सायं 5.00 बजे सेटेलाईट फोन चालू हुआ यात्रीगण बारी-बारी से बात कर रहे थे। मैंने भी घर बात की। सेटेलाईट फोन से बात करने पर काल चार्जेस 30/- प्रति मिनट लिया गया। 7.00 बजे जनरेटर चालू हुआ जिससे प्रकाश व्यवस्था की गई थी। उसी समय सूप दिया गया। रात्रि 8.00 बजे डिनर लिए/स्वीट डिश में आज ‘‘सेवई‘‘ दी गयी। रात्रि 9.00 बजे बिस्तर में आ गए।

क्रमश: .....


डी.पी.तिवारी,

रायपुर

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