आठवें दिन की यात्रा - 26.07.2008

26.07.2008 श्रावण बदी 8 शनिवार

Photobucketकालापानी से नबीढ़ांग की दूरी 9 कि.मी. तथा समुद्र सतह से ऊंचाई 4246 मीटर है .सबेरे 5.30 बजे नींद खुली, चाय पी। काफी तेज एवं ठण्डी हवा चल रही थी मैंने स्नान नहीं किया। कुछ यात्रियों ने गरम पानी से स्नान किया। सभी यात्री तैयार होकर 7.30 बजे डायनिंग हॉल में नाश्ते के लिए पहुंच गए। नाश्ते में आज पूड़ी, छोले दिया गया। यात्री-गण नाश्ते के उपरांत बोर्नविटा लेकर यात्रा प्रारंभ की। कैम्प से लगभग 1 कि.मी. आगे पोनी एवं पोर्टर रात्रि में रूके थे। वहां तक पैदल जाकर आगे घोड़े से यात्रा की। दो ढ़ाई घंटा चलने के बाद आईटीबीपी द्वारा निर्धारित चाय स्थल मैं पहुंचे। आलू चिप्स के साथ चाय लेते हुए सभी यात्रियों ने कुछ देर विश्राम किया।
Photobucketनवीढांग के रास्ते में हरियाली कम दिखी किन्तु घाटी में रंग-बिरंगी फूल जरूर दिखे। सुबह से ही हवा ठण्डी एवं तेज चल रही थी। इसलिए कल की अपेक्षा आज ज्यादा गरम कपड़े सुबह से ही पहनकर, सिर में मैं मंकी कैप तथा हाथ में ऊनी दस्ताने पहन लिया था। नवीढ़ांग के रास्ते में लगभग चारों तरफ बर्फ से ढ़ंकी हुई पहाड़ी चोटी दिखलाई दे रहे थे। जिसके आसपास काफी कोहरा भी था। लगभग 11.30 बजे मैं ‘‘नवीढ़ांग‘‘ पहुंच गया पहुंचते ही रसना से स्वागत किया गया। यात्रियों के लिए निर्धारित डोम में छोटे कैलाश यात्री दो दिन पूर्व से ही रूके हुए थे। यात्री छोटे कैलाश यात्रा के रूट में शामिल नवीढ़ांग में ‘‘ओम पर्वत‘‘ के दर्शन के लिए आए थे। विगत दो दिन से घने कोहरे से ढ़के होने के वजह से ‘‘ओम पर्वत‘‘ के दर्शन नहीं कर पाए थे। अतः चूंकि कैलाश यात्री का पहुंचना प्रारंभ हो गया था इसलिए अब वे भोजन उपरांत धीरे-धीरे कैम्प खाली कर कालापानी के लिए वापस हो रहे है। उनके द्वारा खाली करने के उपरांत उसी डोम में हम लोग रूक रहे थे।
Photobucketआज जिस डोम में हम लोग (मैं स्वयं, मस्करा, तनेजा, विक्रम) रूके वह अपेक्षाकृत बड़ा है। इसमें लगभग 20 यात्री रूक सकते है। यहां के डोम में रूकने की व्यवस्था लकड़ी के तखत न होकर नीचे में ही गद्दे बिछाकर किया गया था। रूकने की जगह सुनिश्चित कर दोपहर का भोजन किए। जिस स्थान पर यात्रियों के रूकने के लिए व्यवस्था बनाया गया है उसके ठीक नीचे आई.टी.बी.पी. जवानों के कैम्प है। कैम्प के ठीक सामने पूर्वी दिशा की ओर “ओम पर्वत“ बताया गया जो कि घने कोहरे से ढका हुआ है। इसलिए हम लोग भी दर्शन नहीं कर पाए। हिमालय की इस पहाड़ी में बर्फ जमने के बाद इस प्रकार दिखाई देता है जैसे किसी ने बर्फ से ओम लिख दिया हो।
सेटेलाईट फोन से घर बात की साथ ही डाली, अविनाश व राहूल से भी बात की हिमालय पर्वत की इस घाटी में पता नही क्यों आज सभी लोग याद आए। मुझे लगा कि मैं आज कहां से कहां किनके आशीर्वाद से पहुंच गया हूं।इन लोंगो से बात करते समय गला रूंध आया आंखों में आंसू आ गए, तुरन्त अपने आपको सम्हालने की कोशिश की। फोन के उपयोग हेतु और यात्री आ गए थे, मैं बाहर आ गया।
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आज की ठण्डी एवं कल यात्रा के वक्त पड़ने वाले ठण्डी को देखते हुए और गरम कपड़ा निकाला तथा लगेज पुनः पैक किया। 6.00 बजे शाम को डोम से बाहर निकलकर चाय पी। जैसे-जैसे शाम होते जा रही थी हवा में ठण्डकता एवं तेजी बढ़ती  ही जा रही थी  रात्रि 8.00 बजे सभी यात्रियों के साथ भोजन किया, उसी समय सभी को बता दिया गया कि कल भारत सीमा पार कर चीन सीमा में प्रवेश करना है। चीनी अधिकारियों द्वारा 5.30 बजे सुबह सीमा पार कराने का समय निश्चित किया गया है। इसलिए समय का ध्यान रखते हुए कल पैदल यात्री रात्रि 2.00 बजे तथा घोड़े वाले यात्री रात्रि 3.00 बजे अपनी-अपनी यात्रा प्रारंभ करेंगे तद्नुसार यात्री तैयार रहें। रात्रि 9.30 बजे जनरेटर बंद होने के पूर्व सो गया। आज तेज ठण्डी और ऊंचांई के वजह से हरारत और सिर में दर्द महसूस हुई।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर

2 comments:

  1. rochak jankaari...mene kaksha men MURARI LAL SHARMA ji ki KAILASH MANSAROVAR KI YATRA padhi thi aaj yaad taja ho gai...

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  2. om nam: siway:
    tiwaray jee mai aapse mansarowar ki yatra ke visay ke bare me kuch vises janna chahta hu,

    jaise-- kab, kaise yatra suru ki jaye.
    aur yatra ke visay me suru se aap mujhe bataye, kya iske liye medical bhi karane padte hai, aur with family bhi jaya ja sakta hai kya.

    kirpya aap mujhe vistrit jankari de iske liye mai aapka bahut abhari rahunga.


    mera email id hai ramkishoresingh01@gmail.com

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