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26 दिवसीय पावन कैलाश मानसरोवर यात्रा वृत्तांत

यात्रा की कडि़यां

Photobucketपहले दिन की यात्रा
दूसरे दिन की यात्रा
तीसरे दिन की यात्रा
चौंथे दिन की यात्रा
पांचवें दिन की यात्रा
छठवें दिन की यात्रा
सातवें दिन की यात्रा
आठवें दिन की यात्रा
नवें दिन की यात्रा
दसवें दिन की यात्रा
ग्‍यारहवें दिन की यात्रा
बारहवें दिन की यात्रा
तेरहवें दिन की यात्रा



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चौदहवें दिन की यात्रा
पंद्रहवें दिन की यात्रा
सोलहवें दिन की यात्रा
सत्रहवें दिन की यात्रा
अट्ठारहवें दिन की यात्रा
उन्‍नीसवें दिन की यात्रा
बीसवें दिन की यात्रा
इक्‍कीसवें दिन की यात्रा
बाईसवें दिन की यात्रा
तेईसवें दिन की यात्रा
चौबीसवें दिन की यात्रा
पच्‍चीसवें दिन की यात्रा
छब्‍बीसवें दिन की यात्रा




भारत सीमा में यात्रा - 14 दिन
(127 कि.मी. पैदल, 1306 कि.मी. बस से, कुल 1433 कि.मी.)
चीन सीमा में यात्रा 12 दिन
(53 कि.मी. पैदल, 411कि.मी. बस से, कुल  464 कि.मी.)
संपूर्ण यात्रा 26 दिन
(180 कि.मी. पैदल, 1717 कि.मी. बस से, कुल 1897कि.मी.)

संस्‍मरण प्रस्‍तुतकर्ता

डी.पी.तिवारी
रायपुर

इस ब्‍लाग के संस्‍मरण एवं चित्र डी.पी.तिवारी के सत्‍वधिकार में है, बिना अनुमति इसमें प्रकाशित लेख एवं चित्रों का पूर्ण या आंशिक अन्‍यत्र प्रयोग वर्जित है, अनुमति के संबंध में dptiwari_52 एट द yahoo.co.in से संपर्क किया जा सकता है.

उन्‍नीसवें दिन की यात्रा शहीद जोरावरसिंह की समाधि के दर्शन : 06.08.2008

06.08.2008 श्रावण सुदी 5 बुधवार


Photobucketप्रातः 6 बजे उठा, नित्यक्रिया से निवृत हो चाय पिया। सभी यात्री हम लोग रवाना होने की तैयारी किए, सामान पैक किए। लगभग 8.00 बजे दरचन से ग्रुप ‘‘बी‘‘ के यात्रीगण कैलाश परिक्रमा पूर्ण कर बस द्वारा कीहू आए। ग्रुप ‘‘ए‘‘ के हम सब यात्री अपना-अपना समान इसी बस में लदवाकर बस में बैठे एवं ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष के बाद तकलाकोट के लिए रवाना हुए। बस में बैठे-बैठे हम सभी यात्री एक-दूसरे को अपने-अपने यात्रा अनुभव सुनते-सुनाते रहे। 9.30 बजे हमारी बस राक्षसताल के पास पहुंची बस यहां पर आधा घंटा रूकी रही इस बीच कुछ यात्री राक्षसताल के पास जाकर जल भर ले आए। उसके पश्चात पुनः रवाना हुए। 11.30 बजे बस तकलाकोट सीमा के बाहर स्थित ‘‘शहीद जोरावरसिंह‘‘ के समाधि के पास रूकी। बताया गया कि 1962 के भारत चीन युद्ध के दौरान भारतीय जवान श्री जोरावरसिंह इसी स्थल पर शहीद हो गए थे। कुछ देर रूकने के बाद बस तकलाकोट शहर के भीतर मार्गों से होते हुए गेस्ट हाऊस ग्राउंड (पुरंग) पहुंच गई। बस से सामान उतारकर गेस्ट हाऊस के ग्राउंड फ्लोर में ही अपना सामान मैं व श्री राजनारायण मस्करा एक कमरे में रखे विगत दो दिन से नहाया नही था, इसलिए पहले स्नान किया आज लंच में केवल टोमेटो सूप दिया गया साथ में ही ग्रुप ‘‘बी‘‘ के द्वारा दरचन से लाया गया उबला चना एवं हलवा लगाया गया था जिसे सभी यात्री दोपहर में खाए। शाम को 4.00 बजे बाजार घूमने गए एवं वही से घर पर फोन द्वारा जानकारी दिया कि मैंने कैलाश एवं मानसरोवर परिक्रमा सकुशल पूर्ण कर ली है। शाम 6.00 बजे (चीनी समय 8.30 बजे) डिनर का बुलावा आया, डिनर में चांवल और आलू खाया। रात में हल्का हरारत महसूस किया तो क्रोसीन टेबलेट खाकर सोया।


क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी
रायपुर

चौदहवें दिन की यात्रा कैलाश परिक्रमा सकुशल सम्पन्न 01.08.2008

01.08.2008 श्रावण बदी 15 शुक्रवार

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आज हम ‘‘जेगंजेरबू‘‘ से रवाना होकर पुनः दरचन पहुंचना है, जिसकी दूरी यहां से 12 कि.मी. है। रास्ता पहाड़ी होने के बावजूद अपेक्षाकृत सपाट है। सबेरे 7.00 बजे नित्यक्रिया से निवृत हो तैयार हो गया चाय पिया। आधा घंटा बाद सभी यात्री दरचन के लिए रवाना हुए। थोड़ी देर पैदल चलने के बाद घोड़े से यात्रा जारी रखा। कल के यात्रा के रास्ता के अपेक्षा आज के यात्रा का रास्ता आसान था, सभी यात्री (पैदल वाले सहित) लगातार बढ़े जा रहे थे। लगभग 5-6 कि.मी. सफर करने के बाद थोड़ा विश्राम किए उसके बाद पुनः आगे बढ़े। 10.00 बजे सुबह हम लोग दरचन पहुंच गए। गेस्ट हाऊस जाकर कैलाश परिक्रमा में जाने के पूर्व जिस कमरे में रूके थे उसी कमरे में आए। पोनी एवं पोर्टर के लिए पारिश्रमिक का अग्रिम भुगतान तकलाकोट में ही किया जा चूका था फिर भी सकुशल कैलाश परिक्रमा सम्पन्न होने से तथा पोर्टर द्वारा ‘‘गौरीकुण्ड‘‘ जाकर जल लाने के कारण उन्हे पुरस्कार स्वरूप कुछ युवान और दिया। पी.सी.ओ. जाकर ‘‘कैलाश परिक्रमा‘‘ सकुशल सम्पन्न होने की जानकारी घर में दिया उधर से बताया गया कि आज सूर्यग्रहण है। विगत तीन दिन से नहाया नही था इसलिए गेस्ट हाऊस कैम्पस के नल में जाकर स्नान किया। उक्त नल में पहाड़ से बर्फ पिघलकर जो पानी झरने के रूप ले लिया था उसी में से पानी लाया जा रहा था जिसके कारण पानी अत्यधिक ठण्डा था फिर भी स्नान करने से बहुत अच्छा लगा।
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दोपहर भोजन तैयार होने की सूचना मिलने पर भोजन करने गया। भोजन में चांवल, दाल, पापड़ लिया। भोजन के दौरान ही पास ही स्थित ‘‘अष्टपद‘‘ जाने की चर्चा हुई, मैं भी वहां जाने के लिए सहमति दिया। दोपहर 3.00 बजे दो जीप (लेण्ड क्रुजर) द्वारा लगभग सभी यात्री ‘‘अष्टपद‘‘के लिए रवाना हुए। ‘‘अष्टपद‘‘ दरचन से 5. कि.मी. दूरी पर है किन्तु पहाड़ी रास्ता के कारण जाने में कुछ समय लगा। ‘‘अष्टपद‘‘ पहुंचने के बाद जीप से उतरकर पहाड़ी झरना (नदी) पार कर एक पहाड़ी के ऊपर सभी यात्री पहुंचे। वहां से कैलाश पर्वत के दक्षिणी हिस्सा का दर्शन होता है। कल ‘‘डोरापुक‘‘ में कैलाश पर्वत के उत्तरी हिस्से का नजदीक से दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ आज दक्षिणी हिस्से का नजदीक से दर्शन का अवसर प्राप्त हुआ। किन्तु कैलाश पर्वत के कल दर्शन के समय पूरा पर्वत हिमाच्छादित न होकर शिखर के नीचे हिस्से मे काले ग्रेनाइट के जैसे पत्थर दिखाई दे रहे थे। लेकिन आज के दर्शन में सपूर्ण पर्वत हिमाच्छादित दिखाई दिया। आज कैलाश पर्वत का दर्शन करते समय यह महसूस हुआ कि साक्षात शिवजी के सिर के मस्तक पर त्रिनेत्र, जटा एवं जटा के बीच से बहती हुई अविरल गंगा की धारा दिखाई दिया। सभी यात्री भी इस वक्त साक्षात शिवजी स्वरूप को महसूस किए।
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अद्भुत चीज यह दिखा कि कैलाश पर्वत सम्पूर्ण हिमाच्छादित है लेकिन उसके साथ जुड़े हुए चारो तरफ के किसी भी पर्वत में बर्फ का नामोनिशान नही हैं किन्तु उसके बाद वाले सभी पर्वतों में बर्फ है। जहां से हम लोग खड़े होकर कैलाश पर्वत का दर्शन कर रहे है हमारे बाई ओर पर्वत जो बिना बर्फ के पत्थर का है के बारे में बताया गया कि जैन धर्मावालंम्बियों के प्रथम तीर्थकर भगवान महावीर शिवधाम कैलाश दर्शन को आए थे तथा इस बांयी पर्वत में आठ पग (पद) आगे चलकर कैलाश में समाहित हो गई इसीलिए इस स्थान को ‘‘अष्टपद‘‘ कहते है। वही पर एक दूसरी पहाड़ी में एक मकान दिखा जहां श्री हरन, श्री राजनारायण गए बाद में मैं भी गया। उस मकान को बौद्धाभिक्षुओं का स्थान गोम्फा बताया गया जहां आज भी बौद्ध लामा रहकर तपस्या करते है। थोड़ी देर और रूककर हम लोग दरचन गेस्ट हाऊस वापस आए।
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गेस्ट हाऊस से ‘‘अष्टपद‘‘ आने-जाने का एक यात्री का किराया 80 युवान (चीनी मुद्रा) जीप वाले को दिया गया। दरचन के बाजार घुमने गए जहां से मानसरोवर के मोती की माला व स्फटिक माला खरीदे। प्रायः सभी यात्री अपने-अपने पसंद के अनुसार यहां खरीदारी किए। रात्रि का भोजन आज पराठा-सब्जी तैयार किया गया था, सभी यात्री एक साथ भोजन किए। भोजनोपंरात गेस्ट हाऊस के गेट के पास ही स्थित पी.सी.ओ. से श्री रविन्द्र चैबे जी से बात किया एवं उन्हे कैलाश परिक्रमा सकुशलता पूर्वक सम्पन्न होने की जानकारी दिया। प्रकाश व्यवस्था जनरेटर द्वारा किया जा रहा था। इसलिए कल के यात्रा के तैयारी के हिसाब से लगेज रात में पैक कर सो गया।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर

तेरहवें दिन की यात्रा शिव स्थल,गौरीकुण्ड और जेंगजेरबू 31.07.2008

31.07.2008 श्रावण बदी 14 गुरूवार

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रात को पानी गिरने से बाहर जगह-जगह बर्फ जम गया, ठण्डी बढ़ गई। सुबह 5.30 बजे सोकर उठा, गुनगुने पानी से ब्रश किया गया। टेण्ट में जाकर चाय पिया फिर आगे की यात्रा के लिए तैयार हुआ, अन्य यात्री भी तैयार हो गए। सुबह 7.00 बजे यात्रा में रवाना होने के पूर्व कैम्प के बाहर से कैलाश के पुनः दर्शन किए। सूर्योदय हो रहा था इस वजह से सूर्य प्रकाश कैलाश के हिमाच्छादित शिखर पर पड़ रहा था जिससे कैलाश शिखर स्वर्ण मंडित जैसे दिखाई दे रहा था। ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ उद्घोष के बाद पैदल यात्रा शुरू किया, घोडे़ वाले को आगे जाकर रूकने को कहा। थोड़ी दूर ही पैदल चलने पर सांस फुलने लग गया चूंकि आगे लगभग 5 कि.मी. खड़ी, संकरी, पथरीली चढ़ाई थी, इसलिए घोड़े से आगे यात्रा प्रारंभ किया। रास्ते में चारो तरफ सिर्फ चट्टान ही चट्टान एवं उसके ऊपर बर्फ के परत दिखाई दे रहा था, पेड़ पौधे एवं हरियाली के नामो निशान नहीं है।
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लगभग 9.30 बजे हम लोग डोल्पा पास पहुंचे जिसकी समुद्र सतह से ऊचाई 18600 फीट हैं इस स्थल को तिब्बती देवता डोमा के नाम से डोल्मा माता का स्थान भी कहते है। यहां सभी यात्री पूजा करते है। रोली, मेंहदी, हल्दी चढ़ाकर एवं कपूर बत्ती, अगरबत्ती जलाकर मैं भी पूजा किया। पूजा स्थल पर बर्फ जमा हुआ है। पास ही ‘‘शिव स्थल‘‘ है वह भी बर्फ से ढंका हुआ है यहां यात्रीगण पुराने कपड़े छोड़ते है अर्थात मुनष्य वर्तमान धारण किए शरीर को छोड़कर नवीन शरीर धारण करता है। यह भी बताया गया कि ‘‘शिव स्थल‘‘ में मृत्यु के देवता यम द्वारा आपका परीक्षा लिया जाता है। आज मौसम साफ है, हल्की धूप निकली हुई है, ठण्ड में धूप अच्छा लग रहा है । यह स्थान समुद्र सतह से काफी ऊंचा है, तेज ठण्डी हवा है व साथ ही बर्फ भी जमा हुआ है, आक्सीजन कम हैं यहां मौसम कभी भी खराब हो जाता है। इसलिए यहां यात्रियों को अधिक समय तक रूकने की सलाह नही दी जाती।
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मैं भी ‘‘डोल्मा माता‘‘ के पूजा कर ‘‘शिवस्थल‘‘ को प्रणाम किया, थोड़ी देर रूककर आगे बढ़ गया। डोल्मा पास के नजदीक के चट्टान को बताया गया कि यह ‘‘भगवती‘‘ तारा देवी की प्रतीक है। डोल्मा से आगे केवल बोल्डर व चट्टानयुक्त पगडण्डी है, पैदल ही चढ़ाई से उतरना है, इसलिए घोड़े वाला आगे बढ़ गया है मैं पोर्टर के साथ धीरे-धीरे छड़ी के सहारे से आगे बढ़ने लगा। थोड़ी ही दूर चलने के बाद पहाड़ी के नीचे घाटी में आपस में मिले हुए दो छोटे-छोटे तालाब जैसे दिखाई दिया, जिसमें का पानी हरें रंग का दिखाई दे रहा है जिसके बारे में बताया गया कि यह ‘‘गौरीकुण्ड‘‘ है मान्यता है कि इसमें भगवती मां पार्वती स्नान करती है। गौरी कुण्ड से जल ले जाने के लिए बाटल मैं अपने साथ में ही लाया था जिसे बैग से निकालकर पोर्टर को दिया और उसे नीचे जाकर ‘‘गौरी कुण्ड‘‘ से जल लाने के लिए भेजा। क्योकि यात्रियों को जल लाने हेतु नीचे खतरनाक फिसलन होने से जाने की सलाह नहीं दी जाती फिर भी कुछ यात्री स्वयं जल लाने नीचे गौरी कुण्ड जा रहे थे तथा कुछ यात्री भी अपने-अपने पोर्टर को जल लाने भेज रहे थे। मेरे पोर्टर द्वारा नीचे जाने एवं जल लेकर ऊपर आते तक मैं इंतजार करते रहा। पोर्टर द्वारा जल लेकर आने के बाद पुनः उसे बैग सौंपकर पहाड़ी से नीचे उतरना प्रारंभ किया, धूप काफी तेज हो गई थी रास्ते में बोल्डर जैसे पत्थर, चट्टान होने तथा ढलान होने से बहुत धीरे-धीरे ही उतर रहे थे, इसके बावजूद भी थोड़ी देर मे थकान हो जाती थी।
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उतरते समय कुछ दूर बर्फीले रास्ते को भी पार करना पड़ा जिसमें कुछ ज्यादा ही सावधानी की जरूरत थी पोर्टर के द्वारा बताया गया कि पहले छड़ी से आगे बर्फ में ठोस स्थान देखलें उसके बाद ही आगे कदम बढ़ाए अथवा पूर्व से पार किए गए यात्री के द्वारा छोड़े गए पैर के निशान के ऊपर कदम रखकर बर्फीली रास्ता पार करे, तद्नुसार ही मैं आगे बढ़ा। लगभग 1.30 बजे मैं पहाड़ी से नीचे उतरकर घाटी में पहुंचा जहां पर नदी बह रही थी घोड़े घास चर रहे थे व घोड़े वाले हमारा इंतजार कर रहे थे वहां पर एक दो झोपड़ी में बनाकर होटल भी चलाया जा रहा था जहां पहुंचकर यात्री, पोनी, पोर्टर, जलपान कर रहे थे। मैं भी वहां रूककर थोड़ी देर विश्राम किया। क्रमशः सभी यात्री यहां पर पहंुचकर थोड़ा जलपान एवं विश्राम अवश्य किए। थोड़ी दूर रूकने के बाद पुनः सभी यात्री यात्रा प्रारंभ किए। दिल्ली के यात्री श्री विक्रम नदी जहां पर संकरा व उथला था वहां से नदी के उस पार जाकर किनारे-किनारे यात्रा कर रहे थे। पहाड़ी उतार-चढ़ाव वाले रास्ते के कारण सभी यात्री अत्यन्त थक गए थे इसलिए जिन यात्रियों ने पोनी की सुविधा लिए थे वे सभी तत्काल घोडे़ के द्वारा यात्रा करना प्रारंभ किए।
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जैसे-जैसे हमारी यात्रा आगे ‘‘जेगेंजरबू‘‘ की ओर बढ़ती जा रही थी वैसे-वैसे नदी चैड़ी और गहरी होती जा रही थी विक्रम को उस तरफ से इस तरफ आने का उपयुक्त स्थान ही नही दिख रहा था, जेगेंजरबू पहुंचने से लगभग 1 कि.मी. पहले ही उसे नदी के उस तरफ रूकने का इशारा कर मेरे घोड़े वाले पोनी को एक अन्य यात्री के अतिरिक्त घोड़ा उस तक भेजकर उसे इस तरफ लाने के लिए भेजा गयां मेरा पोनी नीचे जाकर घोड़े से नदी पारकर दूसरे घोड़े से विक्रम को बिठाकर नदी पार कराकर हम लोग जहां पर रूके थे वहां पर लाया उसके बाद हम लोग जेंगजेरबू के लिए रवाना हुए । डेरापुक से जेगनेजराबू की दूरी 19 कि.मी है तथा समुद्र सतह से 4790 फीट ऊचाई पर है। सायं 4.00 बजे हम कुछ यात्री ‘‘जेंगजेरबू‘‘ पहुंचे एवं कैम्प के कमरे में अपना-अपना स्थान सुरक्षित किए। एक कमरे में मैं राजनारायण, जुनेजा, रामशरण और बालकिशन रूके। कैम्प के पास से पहाड़ी झरना बहकर नीचे नदी मे जाकर मिल रही थी उसी झरने में हाथ मुंह धोकर फ्रेश हुए, फिर चाय पिए। आज रात को खाने में खिचड़ी बना, दिनभर से आज कोई यात्री खाना नही खाए थे सभी यात्री खिचड़ी, अचार और पापड़ खाए। प्रकाश व्यवस्था यहां भी जनरेटर से किया गया जो कि रात 9.30 बजे तक ही उपलब्ध हुआ। थकावट अधिक थी इसलिए जल्दी सो गए।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर

छब्‍बीसवें दिन की यात्रा ज्योतिर्लिंग नागेशं दारूकावन के दर्शन एवं कैलाश मानसरोवर परिक्रमा सकुशल सम्पन्न

13.08.2008 श्रावण सुदी 12 बुधवार


सुबह 3.00 बजे जग गया, मेरे पहले श्री राजनारायणजी जग गए थे, उनके स्नान करने के बाद मैं भी स्नान किया एवं तैयार होकर नीचे काऊटंर के पास आया। रिमझिम पानी गिर रहा था। यात्रीगण तैयार होकर यही पर एकत्र हो रहे थें प्रातः 4.00 बजे हम सभी गेस्ट हाऊस के कर्मचारी को साथ में लेकर ‘‘जागेश्वर धाम‘‘ मंदिर की ओर गए इसी समय बिजली बंद हो गईं अंधेरे में ही हम लोग मंदिर की ओर बढ़ते गए, और थोड़ी देर में मंदिर के गेट में पहुंच गए, जनरेटर द्वारा मंदिर में प्रकाश व्यवस्था बहाल की गई थी। मंदिर के अन्दर गर्भ गृह में जाकर ‘‘भगवान शिव‘‘ का दर्शन किया। थोड़ी ही दूर में एक और मंदिर था वहां भी गया वहां मंदिर के बाहर लिखा हुआ था कि भारत में स्थित बारह ज्योतिलिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग ‘‘नागेशं दारूकावन‘‘ यही है। अंदर जाकर दर्शन किया एवं जिज्ञासावश प्रतिप्रश्न किया कि ‘‘नागेशं दारूकावन अर्थात ‘‘नागेश्वर महादेव‘‘ तो द्वारका के पास स्थित है, तो पुजारियों द्वारा बताया गया कि इस स्थान को भी ‘‘नागेशं दारूकावने‘‘ कहते है। दर्शन उपरांत सभी यात्रीगण पुनः गेस्ट हाऊस आए और आगे की यात्रा हेतु बस मे सवार हो गए पानी तब भी लगातार गिरता रहा। आगे रास्ता में नाश्ता के लिए पुड़ी, सब्जी, गेस्ट हाऊस मेें ही तैयार कराकर पैकेट बनाकर बस में रखा गया एवं प्रातः 5.30 बजे ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष के साथ हमारी बस दिल्ली के लिए रवाना हुई। लगभग 2.30 घंटे की यात्रा के बाद हम लोग प्रातः 8.00 बजे अल्मोड़ा पहुंचे, शहर के बाहर एक होटल के पास बस रूकी सभी यात्री इस होटल में जाकर बैठ गए। बस में साथ में लाए गए पुड़ी, सब्जी का नाश्ता किए एवं चाय होटल में ही बनवाकर पीए। मोबाईल रेंज में आने के वजह से घर बात किया तथा श्री एम.डी. दीवान जी से बात कर कैलाश मानसरोवर परिक्रमा सकुशल सम्पन्न होने के पश्चात दिल्ली वापसी होने की जानकारी दिया। सभी यात्री नाश्ता चाय करने के बाद अल्मोड़ा से रवाना हो गए और 11.30 बजे काठगोदाम पहंुचे। काठगोदाम में कुमाऊ मंडल विकास निगम द्वारा एयर कंडीशन्ड बस लगवाया गया था सभी यात्री वर्तमान बस को छोड़कर इस दूसरे बस में स्थान सुरक्षित किए एवं लगेज भी शिफ्ट किए पानी अचानक तेज गिरना प्रारंभ हो गया, लगेज को तालपत्री से ढ़कवाया गया। चूंकि यहां दोपहर भोजन की व्यवस्था मंडल के गेस्ट हाऊस में था इसलिए सभी यात्री गेस्ट हाऊस जाकर दोपहर का भोजन लिए। भोजन उपरांत गेस्ट हाऊस में स्थानीय पत्रकारगण आ गए उनके द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा एवं यात्रा के प्रायोजक कुमाऊ मंडल विकास निगम के द्वारा की गई व्यवस्था तथा सुझाव के बारे में यात्रियों से फीड बैंक लिया गया। कैलाश मानसरोवर यात्रियों को विदेश मंत्रालय भारत सरकार द्वारा दिऐ जाने वाला प्रमाण पत्र भी यहीं सभी यात्रियों को प्रदाय किया गया। काठगोदाम में लगभग 2.00 घंटे रूकने के पश्चात दापेहर 1.30 बजे दिल्ली के लिए बस द्वारा रवाना हुए। मुरादाबाद के बाद दिल्ली रास्ते में पड़ने वाले एक ढ़ाबे के कैम्पस में 6.00 बजे बस रूकी। यात्रीगण उतर कर चहलकदमी किए और चाय पिए। 7.00 बजे हम लोग पुनः रवाना हुए। रास्ते से ही 9.00 बजे घर मोबाईल से बात कर जानकारी दिया कि दिल्ली थोड़ी देर में पहुंचने वाले है। रात को 10.00 बजे हम लोग दिल्ली पहंुचे ‘‘गुजराती समाज सदन‘‘ भवन के सामने ही सभी यात्रियों का तिलक लगाकर माला पहनाकर श्री उद्य कौशिक जी द्वारा स्वागत किया गया दिल्ली के यात्रीगणों को उनके घरवाले उन्हें लेने आए थें वे रात में ही घर चले गए शेष यात्रीगण अपना-अपना समान बस से उतारकर गुजराती समाज सदन में ले आए। इस भवन के ए.सी. डारमेट्री में ही हम यात्रियों की रूकने की व्यवस्था की गई हैं जहां हम लोग स्थान सुरक्षित कर सामान लाकर रूकते गए। कैलाश मानसरोवर यात्रा से वापस आए हम सभी यात्रियों को कैलाश मानसरोवर यात्री समिति दिल्ली सरकार के अध्यक्ष श्री उद्य कौशिक एवं उनके परिवार के द्वारा गुजराती समाज सदन के ही एक अन्य कक्ष में प्रेम व आग्रहपूर्वक भोजन करवाया गया। सभी यात्री उनके इस कार्य की सराहना किए एवं उन्हे साधूवाद दिए। यात्रा सफलता पूर्वक सम्पन्न कर पुनः दिल्ली लौट आने की खुशी में नींद देर से आई किन्तु गहरी नींद आई सभी निश्चिंतत हो कर सो गए।


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डी.पी.तिवारी
रायपुर

पचीसवें दिन की यात्रा पाताल भुवनेश्वर के दर्शन : 12.08.2008

12.08.2008 श्रावण सुदी 11 मंगलवार


Photobucketसुबह 3.00 बजे मेरी नींद खुल गई प्रायः सभी यात्री जाग गए थे एवं यात्रा की तैयारी कर रहे थे। उसी समय चाय आ गई चाय पिया फिर नहाने की तैयारी किया। थोड़ी देर में स्नान भी कर लिया सुबह-सुबह हल्की ठण्ड लग रही थी किन्तु नहाने के बाद अच्छा भी लग रहा था। यात्रियों के लिए गेस्ट हाऊस कैम्पस में एक बड़ी बस एवं एक मिनी बस खड़ी हुई थी जिसमें सामान भी लद चुका था बस में जाकर सीट सुरक्षित किया एवं वापस डायनिंग हाॅल आकर बोर्नविटा पिया। सभी यात्री बोर्नविटा पीकर बस में बैठते जा रहे थे ठीक 5.30 बजे ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष के साथ हमारी बस गेस्ट हाऊस से रवाना हुई। सुबह होने वाली है किन्तु आसमान में बदली होने व हल्की बुंदाबांदी होने के कारण हल्का अंधेरा भी है। हमारी बस धारचुला बस्ती से निकल कर पहाड़ी रास्ते से होकर आगे बढ़ रही थी पहाड़ी में काफी कोहरा छाया हुआ है चूंकि हम लोग काफी ऊचाई में सफर कर रहे है इसलिए कोहरा हमारे आसपास ही महसूस हो रहा है फिर भी लगातार बस की यात्रा जारी है। लगभग 9.00 बजे हमारी बस मिरथी गांव होते हुए वहां स्थित आईटीबीपी के मिरथी कैम्प में पहुंची। तब तक यहां हल्की धूप निकल आई है कैम्प में जवानों के द्वारा हम यात्रियों का स्वागत किया गया फिर पास ही बने एक भवन में हमें ले जाया गया, उक्त भवन के गेट के पास ही कुछ फोटोग्राफ्स लगे हुए हैं जिसे हम लोग देखे जिसमें हमारी कैलाश मानसरोवर यात्रा में जाते समय लिए गये स्वागत-सत्कार के फोटोग्राफस के अलावा सामूहिक फोटोग्राफ्स भी है। यात्रियों के लिये यहां नाश्ता का इंतजाम आईटीबीपी के द्वारा किया गया है, सभी यात्री यहां नाश्ता का आनन्द लिए, मैं केवल चाय पिया/नाश्ता उपरांत हमें हाल में बिठाया गया जहां सभी यात्रियों को कैलाश यात्रा एवं यात्रा के दौरान आईटीबीपी जवानों के द्वारा दी गई सहायता या असहयोग के बारे में फीड बैक देने हेतु फार्म दिया गया जिसे भरकर वही जमा किए।

Photobucket आईटीबीपी के कमाण्डरतथा लाईजिंग आफिसर श्री व्ही.पी. हरन द्वारा वहां सबको संबोधित किया गया। तत्पश्चात उसी कक्ष में प्रत्येक यात्री को समूह फोटो वितरित किया गया। इस प्रकार इस कैम्प में एक घंटा रूकने के पश्चात 10.00 बजे हम लोग जागेश्वर के लिए रवाना हुए। कैलाश यात्रा में जाते समय हम लोग अल्मोड़ा से मिरथी कैम्प आए थे किन्तु वापसी में हमारी यात्रा मिरथी कैम्प से अल्मोड़ा न जाकर दूसरे रास्ते से आज जागेश्वर पहुंचना है। पहाड़ी सकरे रास्ते से हमारी बस आगे बढ़ते जा रही थी रास्ते का दृश्य मनोहारी एवं अनुपम हैं सभी का आनन्द लेते हुए लगभग तीन घंटा लगातार सफर कर दोपहर एक बजें हम लोग पाताल भुवनेश्वर पहुंचे। बस से उतरकर सभी यात्री पैदल कुछ दूर चलकर पाताल भुवनेश्वर के पास पहुंचे। जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है पाताल अर्थात धरती के नीचे गुफा में भुवनेश्वर है। पहाड़ी के तल के नीचे गुफा में एक बार में 20-25 लोग ही जा सकते है। इसलिए हम लोग दो समूह बनाकर गुफा में बारी-बारी से प्रविष्ट हुए। चुंकि कुमाऊ मंडल विकास निगम के माध्यम से हम लोग वहां पर पहुंचे थे तथा कैलाश मानसरोवर परिक्रमा कर वापस आ रहे है,इसलिए अन्य यात्रियों को रोककर हमे पहले दर्शन करवाया गया। सतह से गुफा काफी गहरी एवं उतरने का रास्ता सकरा हैं जहां जनरेटर से प्रकाश व्यवस्था किया गया है। हम लोग कतार बद्ध होकर गुफा में प्रवेश करना प्रारंभ किए गुफा अत्यन्त सकरा एवं फिसलन युक्त है इसलिए लोहे का संकल लगाया है जिसे पकड़कर ही नीचे उतरना पड़ता है, लोहे के सांकल के सहारे गुफा में हम लोग उतरे जहां पर ढलान जैसा बना हुआ था कुछ देर बाद गाईड (पंडित जी) अन्य दर्शनार्थियों को लेकर और अंदर से दर्शन कराकर लौटे, ये दर्शनार्थी गुफा के बाहर, उसी रास्ते से बाहर की ओर जा रहे थे जिस सकरे रास्ते से हम लोग गुफा में नीचे उतरे थे। उनके जाने के बाद पंडित जी द्वारा हमें गुफा के बारे में तथा गुफा में उत्कीर्ण उभरे हुए स्थानों के बारे में बताते हुए गुफा में और अंदर ले जाकर बताया गया। गुफा में उभरे हुए जिन आकृति के बारे में पंडित जी द्वारा बताया गया वे मुख्यतः क्रमशः आदि गणेश, शेष नाग, ब्रम्हा, विष्णु महेश, कल्पवृक्ष, ऐरावत हाथी तथा शिवलिंग है। पाताल भुवनेश्वर नाथ बताया गया। शिवलिंग के पास ही एक कुण्ड है जिसमें पानी भरा हुआ है।

उसी पानी से तथा पूजन सामग्री से उनके द्वारा शिवलिंग का अभिषेक हम यात्रियों से कराया गया। जिसमें शिवलिंग स्थापित है वह ताम्रपत्र से सुरक्षित है जिसे आदि शंकराचार्य द्वारा कैलाश दर्शन हेतु जाते समय कराया जाना बताया गया। गुफा में कुछ दूर और आगे जाने पर चार अलग-अलग रास्ते भी दिखाई दिए जिसे मानसरोवर व कैलाश जाने के लिए नजदीक एवं गुप्त मार्ग बताया गया, इस गुफा में पांडवों के आगमन की भी जानकारी दी गई इस प्रकार गुफा दर्शन पूर्ण कर हम लोग उसी सकरे चढ़ाई फिसलन वाले रास्ते से सांकल के सहारे चढ़कर गुफा के बाहर निकले। पाताल भुवनेश्वर दर्शन के बाद थोड़ा सा आगे आने पर कुमाऊ मण्डल विकास निगम के द्वारा संचालित रेस्टारेण्ट में यात्रियों के लिए दोपहर भोजन की व्यवस्था की गई थी जहां सभी यात्री भोजन किए चूंकि आज मेरा एकादशी व्रत है इसलिए मैं केवल ‘‘ककड़ी‘‘ ही ग्रहण किया। भोजनोपरान्त लगभग 2.30 बजे बस द्वारा पुनः रवाना हुए तीन चार घंटा यात्रा करने के पश्चात एक जगह रूककर चाय पिए थोड़ा सा टहलकर हाथ पैर सीधा किए। मोबाईल नेटवर्क में आ गया था घर बात किया एवं अन्य लोगो से भी बात किया। उसके बाद पुनः जागेश्वर के लिए रवाना हुए। रात्रि 9.30 बजे हम लोग बागेश्वर होते हुए जागेश्वर पहुंचे तब तक पानी गिरना प्रारंभ हो गया था, हमारी बस कुमाऊ मंडल विकास निगम के गेस्ट हाऊस कैम्पस में जाकर रूकी। पानी गिरने की वजह से ठण्ड बढ़ गई थी जल्दी से गेस्ट हाऊस में जाकर यात्रीगण कमरे में जाने लगे। हम लोग (मैं, राजनारायण, विक्रम, राजेश) एक ही कमरे में रूके । आधे घंटे बाद भोजन का बुलावा आया। चूंकि मंदिर रात्रि 9.00 बजे बंद हो जाती है इसलिए आज दर्शन नही हो सकेगा। इसलिए सभी यात्री नीचे डायनिंग हाल में आकर भोजन किए मैं भी साथ में आया केवल सलाद लिया। रात्रि भोजन कि दौरान ही श्री हरन द्वारा बताया गया कि मंदिर का पट प्रातः 4.00 बजे खुलेगा उस समय भगवान के दर्शन होगें इसलिए सभी यात्री 3.30 बजे तैयार होकर गेस्ट हाऊस के काऊण्टर के पास आ जाए। सभी लोग भोजन कर वापस आकर जल्दी अपने-अपने कमरें में सो गए।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी
रायपुर

तेइसवें दिन की यात्रा छियालेख चेक पोस्ट तक का सफर : 10.08.2008

10.08.2008 श्रावण सुदी 9 रविवार   


Photobucketआज हमें बुधी जाकर रूकना है, गुंजी से बुधी की दूरी अधिक होने से प्रातः   6.00 बजे ही यात्रियों को रवाना होने के निर्देश की वजह से सभी यात्री जल्दी उठ गए। मैं भी प्रातः 4.00 बजे उठ गया, नित्य क्रिया से निवृत हो चाय पिया तत्पश्चात यात्रा के लिए तैयार हुआ। सामान (लगेज) पुनः पैक किया एवं कुछ सामान अलग से बैग में रखा क्योकि अब हमारा लगेज एक दिन के बाद सीधा धारचुला में ही मिलेगा। मेरा पोर्टर आकर पैक किए गए लगेज को कुमाऊ मंडल विकास निगम द्वारा निर्धारित किए गए स्थान में छोड़कर आया जहां से उनके द्वारा सभी यात्रियों का लगेज एक साथ ढुलवाया जाएगा। 5.30 बजे जाकर नाश्ता (इडली, उपमा) किया एवं बोर्नबिटा लिया। 6.00 बजे ‘‘अन्नपूर्णा‘‘ पर्वत के दर्शन हुआ। सभी यात्री ‘‘अन्नपूर्णा मां‘‘ के दर्शन किए। सूर्योदय हो रहा है। सुबह की लालिमायुक्त किरणें अन्नपूर्णा पर्वत के शिखर पर पड़ रही है चूंकि शिखर हिमाच्छादित है। इसलिए सूर्य किरणे पड़ने से ऐसा दिखाई दे रहा है मानो पर्वत शिखर स्वर्णजटित हो। ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष के बाद प्रातः 6.15 बजे गंुजी कैम्प से पैदल ही रवाना हुए क्योकि गुंजी गांव के पास से बहने वाली नदी में बनाए गए लकड़ी के पूल टूटने की जानकारी मिली है। नदी के उस पार जाकर गुंजी गांव पार किए।

गांव के सीमा के बाहर ही एक व्यक्ति भोजपत्र बेचते हुए बैठे मिला जिनसे यात्रीगण भोजपत्र खरीदें। थोड़ी दूर और पैदल चलने के बाद घोड़े वाला मिला उसके बाद मैं घोड़े से आगे की यात्रा जारी रखा, चूंकि सभी यात्रियों की  घर वापसी हो रही थी इसलिए पैदल हो, चाहे घोड़े वाले यात्री हो सभी की गति सामान्य से कुछ ज्यादा ही थी। हम लोग 7.30 बजे गब्र्यांग चेक पोस्ट पहुंचे वहां पासपोर्ट की चेकिंग के बाद पंजी में प्रविष्टि की गई, चाय पीकर पुनः आगे बढ़े लगभग 9.00 बजे छियालेख चेक पोस्ट पहुंचे यहां पर भी आई.टी.बी.पी. के जवानों द्वारा पासपोर्ट चेक किया गया एवं इन्ट्री किया गया। मेरे साथ 2-4 यात्री ही वहां पर पहुंच पाए अर्थात हम लोग सबसे पहले पहुंचे। छियालेख से बुधी कैम्प का रास्ता पहाड़ी में खड़ी ढलान वाला होने से पैदल ही उतरना होता है। इसलिए मैं भी घोड़ा छोड़कर पैदल दिल्ली के यात्री श्री राकेश जुनेजा एवं बंगलोर के श्री शास्त्री जी के साथ उतरना प्रारंभ किया। लगभग दो घंटा पैदल (3 कि.मी. ढलान) चलने के बाद हम लोग बुधी कैम्प पहुंचे, कैम्प में पहुंचते ही रूकने का स्थान सुरक्षित किया। दोपहर के बारह बज रहे थे, हवा ठण्डी चल रही थी किन्तु धूप भी अच्छी तेज थी। इसलिए सबसे पहले मैं स्नान करने की तैयारी किया। पानी बहुत ठण्डा था फिर भी उसी में नहाया, नहाने के बाद बहुत हल्का एवं अच्छा महसूस किया। लगभग 1.00 बजे श्री राजनारायणजी भी पहुंचे उन्हें मेरे बाजू वाले स्थान में रूकवाया गया, वे भी स्नान किए। दोपहर दो बजे साथ में भोजन किए। बाहर ठण्डी हवा तेज चल रही थी इसलिए डोम के अन्दर ही विश्राम किए। रात्रि में प्रकाश व्यवस्था जनरेटर द्वारा किया गया। 6.00 बजे सूप दिया गया एवं 7.00 बजे भोजन के लिए बुलाया गया। रात्रि भोजन में चांवल, दाल, रोटी सब्जी, सेवई (मीठा) दिया गया। भोजन के दौरान ही यात्रियों को बताया गया कि कल हमें गाला न जाकर अन्य रास्ते से मंगती पहुंचना एवं वहां से बस द्वारा कल ही धारचुला पहुंचना है इसलिए कल पैदल यात्रा प्रातः 4.00 बजे तथा घोड़े वाले यात्री 5.30 बजे रवाना होगें। भोजन उपरांत रात्रि में 9.00 बजे मैं सो गया।


क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी
रायपुर

बाइसवें दिन की यात्रा कालीमाता मंदिर दर्शन : 09.08.2008

09.08.2008 श्रावण सुदी 8 शुक्रवार


Photobucketप्रातः 7.00 बजे मेरी नींद खुली, बिना स्नान किए तैयार हुआ। तकलाकोट से वापसी के बाद लगेज (सामान) को पुनः पैक किया। इसी बीच 7.45 बजे नाश्ता में पुड़ी सब्जी दिया गया, तत्पश्चात बोर्नबिटा पिया/उसके बाद सभी यात्री प्रातः 8.00 बजे गुंजी के लिए रवाना हुए। वापसी के दौरान भी प्रायः सभी यात्री कालीमाता मंदिर दर्शन हेतु गए। वहां से काली नदी का जल लिया एवं ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष के साथ पैदल रवाना हुए। काली नदी में बने लोहे के पुल के पास ही एक व्यक्ति को भोज पत्र बेचते देखा गया, मैं वहां रूककर 20.00 रू. में भोजपत्र खरीदा, मेरे अलावा भी कई यात्री भोजपत्र खरीदें तथा यह भी जानकारी दिए कि गुंजी में भोजपत्र अच्छा मिलता है। कुछ दूर पैदल चलने के बाद घोड़े से आगे की यात्रा जारी किया। कालापानी से गुंजी की दूरी भी कम है तथा रास्ता अपेक्षाकृत ज्यादा दुर्गम नही होने के कारण 11.00 बजे ही मैं गुंजी के आईटीबीपी कैम्प पहुंच गया। मेरे से पहले लाइजनिंग आफिसर श्री हरन एवं एक अन्य यात्री वहां पहुंचे थे। उन्ही के साथ थोड़ी देर बैठा एवं वही चिप्स व चाय लिया उसके पश्चात यात्री कैम्प में गया। वहां पहुंचकर उसी डोम (कैम्प) में रूका जिसमें यात्रा में जाते समय रूके थे। वहां पहुंचकर सभी को रसना दिया गया। दोपहर 12.30 बजे लंच दिया गया। दोपहर भोजन में आज चांवल, दाल, पालक व मूली का रायता दिया गया।


आदि कैलाश जाने वाले यात्री भी आज गूंजी कैम्प में पहुंचे इसलिए भीड़ कुछ अधिक हो गई जिसके कारण एक-एक डोम में 10-12 यात्री को रूकवाया गया। कैम्प में जिस पाईप के माध्यम से पानी आपूर्ति की जा रही थी वह भी आज बंद था जिसका कारण बताया गया कि जिस पहाड़ी से झरने से पाईप लगाकर पानी लाया जा रहा है वहां पर चट्टान गिरने से पाईप क्षतिग्रस्त हो गया है।

Photobucketहमारे साथ के जिन यात्रियों का सामान कैलाश परिक्रमा के लिए जाते समय गुंजी कैम्प नही पहुंच पाया था। उनमें से 4 यात्रियों के सामान मिलने की जानकारी हुई कुमाऊ मण्डल विकास निगम के द्वारा उन्हें आज दिया गया। शेष दो यात्रियों का सामान अभी तक भी नही मिल सकने की सूचना दी गई। जिन यात्रियों का सामान मिला था उसे उनके द्वारा खोला गया, लगेज के भीतर पानी चले जाने से कपड़े एवं अन्य सामान भीगें हुए थे जिसे उनके द्वारा धूप में फैलाकर सुखाया गया।

सायं 4.30 बजे चाय के समय डायनिंग हाल में यात्रा के फीड बैंक मीटिंग हुई। सभी यात्रियों के द्वारा अपने-अपने अनुभव एवं विचार कैलाश मानसरोवर यात्रा एवं उसके व्यवस्था के सम्बन्ध में राय व्यक्त किया गया। उक्त बैठक में मेरे द्वारा राय व्यक्त किया गया कि कैलाश मानसरोवर यात्रा के सम्बन्ध और ज्यादा प्रचार-प्रसार विशेषकर छत्तीसगढ़ जैसे नवोदित राज्य में करने की आवश्यकता प्रतिपादित किया गया। क्योंकि 2008 के वर्तमान यात्रा के सम्बन्ध में मात्र एक दिन राज्य के स्थानीय समाचार पत्र में विज्ञापन प्रकाशित हुआ है। जिसके कारण इसकी जानकारी अधिक लोगों को नही हो पाई। 6.00 बजे आईटीबीपी कैम्प स्थित मंदिर में भजन एवं आरती उपरान्त प्रसाद वितरण किया गया तथा सभी यात्रियों को आईटीबीपी के मोनो वाली प्रतीक चिन्ह प्रदान की गई। रात्रि डिनर में चांवल, दाल, सब्जी एवं सेवई (मीठा) दिया गया। प्रकाश व्यवस्था जनरेटर द्वारा किया जा रहा था। इसलिए 9.30 बजे रात तक ही प्रकाश व्यवस्था किया गया।


क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी
रायपुर

इक्‍कीसवें दिन की यात्रा ‘‘ऊं‘‘ पर्वत के आंशिक दर्शन : 08.08.2008

08.08.2008 श्रावण सुदी 7 शुक्रवार

Photobucketकल रात में ही डिनर के समय सभी यात्रियों को बताया गया कि आज 7.00 से 7.30 बजे चीन सीमा पार करना है इसलिए गेस्ट हाऊस से बस द्वारा 5.30 बजे सुबह रवाना होगें, इसलिए अपना सामान प्रातः 4.00 बजे ही गेस्ट हाऊस के काऊण्टर के पास पहुंचाए। उसी के अनुरूप हम लोग प्रातः जल्दी उठ गए। श्री राजनारायणजी स्नान किए मैं नही नहाया, तैयार होकर अपना-अपना सामान काऊण्टर के पास लाकर छोड़ दिए जिसे बस मे चढ़ाया गया , उसके बाद 5.00 बजे जाकर नाश्ता लेकर चाय पिए। ठीक 5.30 बजे सुबह (चीनी समय 8.00 बजे सुबह) हमारी बस ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष के साथ गेस्ट हाऊस से बार्डर के लिए रवाना हुई रास्तें मे सेना कैम्प के बेरियर पर रूककर आवश्यक औपचारिकता पूर्ण कर पुनः आगे बढ़ी, बस यात्रा केवल 13 कि.मी. तक ही संभव हो पाया क्योकि इसके आगे सड़क ही नही हैं आगे केवल पहाड़ी चढ़ाई एवं पगडण्डी है। रिमझिम पानी गिरना प्रारंभ हो गया। बस से उतरते ही हमें वहां पर घोड़ा उपलब्ध कराया गया सभी यात्री घोड़े पर बैठकर आगे लिपुलेखपास की ओर रवाना हुए। हल्की बुंदाबादी होने तथा हवा चलने से ठण्ड और बढ़ गई। पहाड़ी रास्ते में पानी की रिमझिम फुहारों एवं ठण्डी में आगे चढ़ते गए कई स्थानो पर रास्तें मे बर्फ जमने के कारण बर्फीली रास्ता भी पार करते हुए लगभग 7.00 बजे लिपुलेखपास (भारत चीन सीमा) पहुंच गए। चीनी सेना के जवान तथा कुछ अधिकारी वहां पर पहले से एक तरफ खडे़ थे तथा दूसरी तरफ भारत तिब्बत सीमा पुलिस के जवान व अधिकारी थे। वीजा स्वीकृति पत्र में क्रम से यात्रियों के नाम लिखे हुए थे उसी क्रम से हमें नाम से वहां पर पुकारा जा रहा था। उस सूची में मेरा नाम 10वें क्रम में था, मेरा क्रम आने पर मुझे भी पुकारा गया, मैं वहां पहुंचा, मेरा पासपोर्ट चीनी अधिकारियों द्वारा मुझे वापस किया गया। एक अन्य अधिकारी द्वारा चीनी रेशमी दुपट्टा मेरे गले में डालकर ओम नमः शिवाय कहकर हाथ मिलाया गया, पश्चात मैं भारत सीमा में प्रवेश किया। पानी लगातार गिर ही रहा था। अतः तत्काल पासपोर्ट व रेशमी दुपट्टा को बैग में डालकर ओम नमः शिवाय कह आगे बढ़ गया। लिपुलेखपास (सीमा) से भारत की ओर पहाड़ी में नीचे की ओर पगडण्डी से आया वहां पर मेरा भारतीय पोर्टर नवीढ़ांग से आते हुआ मिला उसे बैग सौंपा फिर थोड़ी देर आगे चलने के बाद मेरा भारतीय पोनी घोड़े सहित मिला वहीं से घोड़े में बैठकर मैं नवीढ़ांग जाने के लिए पहाड़ी उतरने लगा। पानी गिरना बंद हो गया हल्की धूप निकल आयी थोड़ी ठण्ड भी कम हो गई इसके अलावा हम अपने वतन में सकुशल लौट आए इस सबकी विशेष अनुभूति हद्य में हुई। मैं 9.15 बजे सुबह नवीढ़ांग कैम्प पहुंच गया कुछ यात्री भी पहुंच चुके थे तथा शेष लगातार आ ही रहे थे। आज यात्रियों के रूकने का कार्यक्रम कालापानी कैम्प में है इसलिए यात्रियों के दोपहर का भोजन कुमाऊ मण्डल विकास निगम द्वारा नवीढ़ग में निर्धारित किया गया है।

Photobucketयात्रीगण आते जा रहे थे एवं गरमागरम भारतीय भोजन (चांवल, दाल, रोटी सब्जी) का आनन्द लेते जा रहे थे। मैं भी भोजन ग्रहण किया, पश्चात बाहर धूप में आकर धूप का आन्नद लिया। सबेरे बदली रहने, पानी गिरने के वजह से सभी पहाड़ी चोटियों कोहरे से ढ़की हुई थी किन्तु मौसम साफ होने व धूप निकलने से कोहरे धीरे-धीरे कम हो रही थी। नवीढ़ांग में सभी यात्री भोजन कर कोहरे छंटने व ओम पर्वत के दर्शन करने का इंतजार करते हुए धूप का आनन्द ले रहे थे। लगभग दो घंटे के इंतजार में कोहरा कुछ कम हुआ। किन्तु इसके बाद भी ‘‘ऊं‘‘ पर्वत के आंशिक दर्शन हो पाया। लेकिन कोहरा इतना कम हो गया था कि उक्त पर्वत में ‘‘ऊं‘‘ अक्षर की आकृति में बर्फ जमने की स्थिति स्पष्ट परिलक्षित हो रही थी। इस प्रकार सभी यात्री ‘‘ऊं‘‘ पर्वत के दर्शन कर आगे की यात्रा पर 11.10 बजे रवाना हुए। यहां से कालापानी की दूरी 9 कि.मी. है। कुछ यात्री पैदल तथा कुछ घोड़े पर रवाना हुए, कालापानी से लगभग 1 कि.मी पहले आईटीबीपी के जवान हमारे स्वागत में आलूचिप्स और चाय लेकर तैयार मिले सभी यात्री चिप्स और चाय की चुस्किया लेते हुए कुछ देर ठहरकर थकान मिटाए एवं पुनः रवाना हुए। लगभग 3.00 बजे कालापानी पहुंचा एवं उसी डोम में अपना बैग रखवाया जिसमें यात्रा में आते हुए रूके थें चीन सीमा से लिपूलेखपास होकर नवीढांग होते हुए यात्रियों का सामान खच्चर से लाया जा रहा था जो क्रमशः कालापानी कैम्प में पहुंच रहा था। मेरा सामान आने पर पोर्टर द्वारा पहचान कर कैम्प में लाकर छोड़ दिया गया। हमारे कैम्प (डोम) में रूकने वाले सभी यात्री पहुंच गए थे हम सब एक साथ चाय पिए। फिर सेटेलाईट फोन के द्वारा मैं घर बात किया। हमारे साथ यात्रा पर गए हुए गुजरात के 6 यात्री दिल्ली जल्दी पहुंचना चाह रहे थे इसलिए वे लाईजिंग आॅफिसर से अनुमति लेकर कालापानी में चाय पीकर सीधे गंुजी कैम्प के लिए रवाना हुए। डोम आकर विश्राम किया। कुछ देर बाद हमे सूचित किया गया कि आईटीबीपी के द्वारा आज यात्रियों के वापस आने की खुशी एवं स्वागत में कालीमंदिर में भजन व वही पर पास में ही ‘‘बड़ा खाना‘‘ का कार्यक्रम रखा गया है। शाम 6.00 बजे पुनः मौसम खराब हो गया पानी गिरना प्रारंभ हो गया फिर भी सभी यात्री कैम्प से नीचे स्थित कालीमंदिर गए एवं भजन आरती में शामिल हुए। उसके पश्चात रात्रि 8.00 बजे रात्रिभोज (बड़ाखाना) मे सम्मिलित हुए। आईटीबीपी द्वारा दिए गए रात्रि भोज में पुड़ी सब्जी, मीठा चांवल, बुंदी रायता, पापड़, सलाद व साबूदाना (मीठा) दिया गया। सभी यात्री आनन्दपूर्वक भोजन किए एवं वापस 9.30 बजे डोम आकर सो गए।


क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी
रायपुर

बीसवें दिन की यात्रा प्राचीन हिन्दु मंदिर के दर्शन : 07.08.08

07.08.2008 श्रावण सुदी 6 गुरूवार


Photobucketसुबह 5.00 बजे नीद खुली, तबीयत ठीक लगा। नित्य क्रिया से निवृत हो तैयार होकर डायनिंग हाल आ गया। आज नाश्ते में ब्रेड एवं फल्लीदाना दिया गया, सभी यात्री नाश्ता एक साथ किए। सुबह 7.30 बजे बस द्वारा मानेस्टरी (Monestery) देखने Ngri रवाना हुए जो गेस्ट हाऊस से लगभग 20 कि.मी. दूर है। Ngri बस्ती में पहुंचने के बाद बस रूकी सभी यात्री वहां स्थित प्राचीन हिन्दु मंदिर गए वहां राम लक्ष्मण सीता के आदमकद मूर्ति स्थापित है। कतारबद्ध होकर सभी यात्री दर्शन किए घी का दीपक जलाए, मंदिर अत्यन्त प्राचीन है जिसके अंदर का हाॅल एवं गर्भ गृह में लकड़ी से कलाकृति उकेरी गई है। हिन्दु मंदिर के बाजू में ही गोम्फा है। जहां बुद्ध की आदमकद प्रतिमा स्थापित है सभी यात्री वहां भी दर्शन किये यहां भी लकड़ी में कलाकृति बने हुए देखे। दोनो स्थलों के दर्शन के उपरांत 11.00 बजे वापस गेस्ट हाऊस तकलाकोट आए। स्नान किया फिर दोपहर भोजन किया। आज लंच में सूप, सब्जी, चांवल खाया। इमीग्रेशन चेक हेतु सभी यात्री अपना पासपोर्ट जमा किए। लगभग 2.30 बजे मैं और श्री मस्करा जी बाजार गए।

फोन से घर बात किया एवं आठ नौ अन्य नजदीकी लोगों से बातकर यात्रा सम्पन्न होने की जानकारी दिया। बाजार से कुछ गरम कपड़े एवं अन्य सामान खरीदे यहां अधिकांश दुकानदार तिब्बती है प्रायः सभी दुकानों में तथा सभी सामानों में यहां मोलभाव बहुत होता है। दुकानदार चीनी युवान के साथ ही साथ भारतीय मुद्रा रूपये में अपना सामान बेच रहे थे। 5.00 बजे गेस्ट हाऊस वापस आकर सामान पैक किए। 5.30 बजे डिनर का बुलावा आया। डिनर में सूप, चांवल, सब्जी आलू का दिया गया। चावंल आलू खाया। रात को हमारा पासपोर्ट वापस दिया गया।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी
रायपुर

चौबीसवें दिन की यात्रा धारचुला के लिए रवाना : 11.08.2008

11.08.2008 श्रावण सुदी 10 सोमवार


Photobucketकल रात को हुई चर्चा एवं निर्देंश अनुसार प्रायः सभी यात्री रात 3.00 बजे उठ गए, चाय डोम में ही लाकर दिया गया। नित्य क्रिया से निवृत हो तैयार हुए। पैदल वाले यात्री 4.00 बजे रवाना भी हो गए। चूंकि मैं यात्रा के लिए घोड़ा लिया था इसलिए अन्य घोड़े वाले यात्रियों के साथ रवाना हुआ। बुधी से आगे का रास्ता काफी सकरा खतरनाक घाटी एवं तेज बहाव वाले झरनायुक्त है। इसलिए सावधानी पूर्वक धीरे-धीरे हम लोग आगे बढ़ते गए। लगभग 2.30 से 3 घंटे चलने के बाद हम लोग कुछ समतल मैदान जैसे भू-भाग में पहंुचे यह मालपा कैम्प है। कुमाऊ मंडल विकास निगम द्वारा यात्रियों के लिए यहां एक छोटे से होटल में चाय-नाश्ता का इंतजाम किया गया था, ंसभी यात्री यहां पहुंचकर नाश्ता के साथ-साथ थोड़ा विश्राम कर रहे थे। हम लोग भी वहां पर रूके नाश्ता में छोले-पराठा एवं अचार दिया गया। नाश्ता करने के आधा घंटा रूकने के पश्चात पुनः यात्रा में आगे बढ़े। मालपा में 1998 में हुई दुर्घटना में मृत यात्रियों के याद में स्मारक बनाया गया है। वही से पार कर आगे बढ़े। आगे का रास्ता पथरीला, पहाड़ी सकरा होने के कारण पैदल ही बढ़े। रास्त में दाहिनी तरफ पहाड़ी जिसके ऊपर से स्थान-स्थान पर झरने गिर रहे थे, तथा बांयी ओर काफी नीचे (300-400 फीट) पहाड़ी काली नदी तेज रफ्तार से बह रही थी, पहाड़ी के ऊपर झरने के पानी गिरने से पगडण्डी फिसलनयुक्त हो गया है। अत्यन्त सावधानी पूर्वक धीरे-धीरे चलते हुए हम लोग आगे पैदल ही बढ़ें जा रहे हैं लगभग 10.00 बजे हम लोग लखनपुर पहुंचे। यहां पर थोड़ा विश्राम किए। यहां से दो रास्ता हो जाता है एक रास्ता पहाड़ी के ऊपर से होते हुए गाला जाता है, इसी रास्ते से हम लोग कैलाश मानसरोवर परिक्रमा के लिए जाते हुए आए थे, तथा दूसरा रास्ता पहाड़ी से नीचे नदी की ओर उतर कर नदी के किनारे-किनारे ही सीधा मंगती जाता है। चूंकि आज हमें सीधा मंगती जाकर वहां से धारचुला तक जाना है इसलिए लखनपुर से हम लोग पहाड़ी रास्ते से सावधानीपूर्वक नदी की ओर नीचे पैदल ही उतरे तत्पश्चात नदी के किनारे-किनारे ही कुछ दूर पैदल एवं कुछ दूर घोड़े से यात्रा करते हुए बढ़ते रहे। इसी प्रकार लगभग एक डेढ़ घंटा चलने के बाद मंगती पहुंचा मेरे से पहले 3-4 और यात्री वहां पहंुच गये थे, यात्रा में जाते समय हम यात्रियों को मंगती से ही पोनी एवं पोर्टर उपलब्ध कराया गया था। वापसी में भी वे यही तक के लिए ही थे। क्योंकि आगे सड़क मार्ग से बस द्वारा धारचूला पहुचना है ंइसलिए कुमाऊ मण्डल विकास निगम द्वारा निर्धारित दर के अनुसार पोनी को रूपये 2970.00 (3100.00) तथा पोर्टर को रूपये 2574.00 (2700.00) यहीं भुगतान कर विदा किया।

Photobucketयात्रियों के लिए दोपहर का भोजन निगम के द्वारा धारचुला से ही मंगाया गया था जो थोड़ी देर में ही पहंुच गया। उन्हीं के द्वारा जानकारी दी गई कि धारचुला रास्ते मे चट्टान गिरने से रास्ता बंद हो गया जिसके कारण निगम की बस मंगती तक नहीं आ पाएगी अतः जैसे ही हम लोग भोजन कर लेगें जीप द्वारा रवाना होगें। हमारे भोजन करते तक कुछ और यात्री आ गए थे। इस प्रकार हम लोग 20-22 लोग हो गए थे। जल्दी से भोजन कर दो जीप से धारचुला के लिए रवाना हुए। जीप द्वारा लगभग 7-8 कि.मी. यात्रा तय करने के बाद रूक गए, क्योकि आगे सड़क पर चट्टान गिरने की वजह से आना जाना अवरूद्ध था। जीप से हम लोग उतर कर अवरूद्ध चट्टान युक्त रास्ते को सावधानीपूर्वक पैदल पार किए। चूंकि पोर्टर को मंगती में ही छोड़ दिए थे। इसलिए जो बैग पोर्टर के द्वारा ढ़ोया जाता रहा उस बैग को अब हम लोग स्वयं लेकर उक्त रास्ता पार किये। यद्यपि बैग में सामान नही के बराबर था किन्तु उसमें मानसरोवर के जल वाला जरीकेन एवं बाॅटल रखा हुआ था इसलिए कुछ वजनी था। कुछ दूर पैदल जाकर रूक गए, यही पर धारचुला से आने वाली बस का इंतजार किए। थोड़ी देर बाद कुमाऊ मंडल विकास निगम की बस आई जिसमें हम लगभग 20-22 यात्री सवार होकर धारचुला दोपहर 2.30 बजे पहुंचे, ठीक उसी गेस्ट हाऊस में रूके जहां पर यात्रा में जाते समय रूके थे। धूप अच्छी तेज थी थकावट भी था इसलिए यहां गेस्ट हाऊस में मैं स्नान किया। 3.30 बजे विक्रम, राकेश (दिल्ली) व मैं सामने नेपाल वाले दारचुला (1 कि.मी.) पैदल पुल पार कर गए, वहां के बाजार घूमकर हम लोग 5.00 बजे वापस आए तत्पश्चात पी.सी.ओ. में जाकर घर बात किया। 6.00 बजे तक शेष सभी यात्रीगण भी आ गए तथा हमारा कामन लगेज भी आ गया। आगामी दो दिन की यात्रा भी बस से करनी है तथा लगेज भी दो दिन बाद ही मिलेगी इसलिए दो दिन का सामान एवं बस में सफर के लायक कपड़े निकाला व सामान पुनः पैक किया। शाम को सूप लिया। गेस्ट हाऊस के काऊंटर से ‘‘कैलाश‘‘ एवं ‘‘ओम पर्वत‘‘ के फोटोग्राफ्स खरीदा। आगे यात्रा के अनुसार सभी यात्री अपना-अपना सामान पुनः पैक किए। रात्रि के भोजन में चांवल, दाल, रोटी और दो सब्जी तथा सेवई (मीठा) दिया गया। भोजन के दौरान ही हमें बता दिया गया कि सभी यात्री अपना-अपना सामान रात्रि 10.00 बजे तक गेस्ट हाऊस के काऊण्टर के पास पहुंचा देवे ताकि सामान रात में ही बस में लदवा दिया जाएगा, तथा कल की यात्रा काफी लंबी है, इसलिए सुबह यात्री जल्दी तैयार हो जाए बस 5.00 बजे यहां से रवाना होगी। निर्देशानुसार भोजन के बाद हम सभी यात्री अपना-अपना सामान कांऊण्टर के पास पहुंचा दिए फिर सोने की तैयारी किए।


क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी
रायपुर

अट्ठारहवें दिन की यात्रा दरचन से कैलाश परिक्रमा :05.08.2008

Photobucketकुगु ;फनहनद्ध से कीहू ;फनीनद्ध की दूरी मात्र 10 कि.मी. है जहां आज हमें जाकर रूकना है। प्रातः 6.00 बजे सोकर उठा, तैयार होकर चाय पिया। 7.00 बजे लगेज बस में लदवाया गया। सुबह 7.30 बजे हमारी यात्रा आगे के पड़ाव के लिए रवाना हुआ। मानसरोवर के किनारे-किनारे उबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते में लगभग एक घंटा सफर करने के बाद हमारी बस रूकी। मानसरोवर के पूरी परिक्रमा के दौरान हमारे सफर में दाहिने तरफ समुद्र जैसे विशाल विस्तृत मानसरोवर की अथाह जल राशि एवं बाए तरफ हिमालय के पर्वत श्रृंखलाएं मिली। जहां पर बस रूकी वहां से 10 कदम की दूरी पर ही मानसरोवर के जल में कुछ यात्री स्नान किये, कुछ यात्री मानसरोवर का जल लिए, मैं भी जल एक और दूसरे बाटल में भरा कुछ यात्री मानसरोवर के जल एवं किनारे से पत्थर चुनना (एकत्र) किये। बायी तरफ के पहाड़ी के ऊपर स्थित गोम्फा में कुछ यात्री दर्शन हेतु गए। लगभग एक घंटा यहां पर रूकने के पश्चात पुनः हम सभी यात्री बस से आगे रवाना हुए। 10.30 बजे हम लोग ‘‘कीहू‘‘ पहुंच गए। बस से अपना-अपना सामान लेकर यात्रियों के लिए बने गेस्ट हाऊस के कमरों में यात्रीगण प्रवेश किए। एक कमरे मंे मैं, राजनारायण, जुनेजा जी एवं रामशरण जी रूके। इसी प्रकार हम लोग एक साथ ‘‘कुगु‘‘ में भी रूके थे। गेस्ट हाऊस में एक लाइन से कमरे बने हुए है, सभी कमरों में चार-चार लकड़ी के तखत व बिस्तर लगे हुए है। इसी में से एक कमरे में किचन है जिसमें महिला सहयात्रियों द्वारा दोपहर भोजन की तैयारी की जा रही है । कमरों के साथ टायलेट बाथ की सुविधा नहीं है गेस्ट हाऊस से कुछ दूरी पर ही मिट्टी से घेरकर कच्चा टायलेट बिना छत के बनाया गया है। आज दोपहर के भोजन में खिचड़ी बना है। सलाद के साथ खिचड़ी खाकर विश्राम किया। कुछ यात्री नजदीक के पहाड़ी के ऊपर बने गोम्फा में दर्शन हेतु गए।

शाम को 4.00 बजे चाय पीकर कुछ यात्रियों के साथ जाकर मानसरोवर के किनारे ही बने पुराना यात्री निवास देखे। थोड़ी दूर मानसरोवर के किनारे-किनारे पैदल जाकर पहाड़ी में बने गुफा एवं शिवलिंग का दर्शन किए। कुछ और शाम होने पर मौसम में बदलाव हुआ इसलिए जल्दी वापस गेस्ट हाऊस आ गए। कुछ बुंदाबांदी भी हुई। यात्रियों के द्वारा कमरे में बैठकर श्री ईश्वर भट्ट (मंगलोर) से अपने-अपने द्वारा मानसरोवर से एकत्र किए गए पत्थरों की परख करवाते जा रहे थे।

दिनांक 29.07.08 को तकला कोट से यात्रा प्रारंभ कर गु्रप ‘‘बी‘‘ के यात्रीगण को यहां छोड़कर इसी स्थान ‘‘कीहू‘‘ से हमारा ग्रुप ‘‘ए‘‘ दरचन के लिए आगे बढ़ गया था एवं दिनांक 30.07.08 को दरचन से कैलाश परिक्रमा हेतु रवाना होकर तथा ‘‘कैलाश परिक्रमा पूर्ण‘‘ कर पुनः 01.08.08 को दरचन आकर रूके, फिर दूसरे दिन 02.08.08 को दरचन से मानसरोवर परिक्रमा हेतु रवाना होकर तथा ‘‘मानसरोवर परिक्रमा पूर्ण कर‘‘ एवं उसमें स्नान कर आज दिनांक 05.08.08 को ‘‘कीहू‘‘ पहुंचे है। अर्थात 29.07.08 से 05.08.08 के (आठ दिन) अवधि में ‘‘कैलाश एवं मानसरोवर‘‘ के दर्शन, परिक्रमा एवं ‘‘स्नान‘‘ पूर्ण कर कीहू में रूके है। हमारी यह यात्रा निर्विघ्न सम्पन्न होने एवं सभी यात्रीगण स्वस्थ है, इसलिए आज रात भोजन में खीर एवं पुड़ी खाए यद्यपि भोजन अच्छे ढंग से तैयार किया गया है, तथापि आज का भोजन सभी को उत्तम एवं सुस्वादु लगा। प्रकाश व्यवस्था जनरेटर से किया गया है, 9.30 बजे तक ही उक्त व्यवस्था रहेगा बाहर हवा भी ठण्डी चल रही है। अतः सभी यात्री अपने-अपने कमरे में जाकर सो गए।


क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी
रायपुर

सत्रहवें दिन की यात्रा मानसरोवर में पवित्र स्‍नान : 04.08.2008

04.08.2008 श्रावण सुदी 3 सोमवार

Photobucketआज हम लोग 2.30 बजे रात को ही उठ गए। कल रात के ठण्ड को देखते हुए टार्च लेकर आज ज्यादा गरम कपड़े तथा रजाई लेकर गेस्ट हाऊस के बाहर गोम्फा के पास मानसरोवर के किनारे जाकर बैठ गए। रात का मौसम कल रात जैसा ही है। इसके बावजूद भी आज ज्यादा यात्री यहां पर आ गए। लगभग 3.00 बजे आसमान से दो सितारे नीचे की ओर टिमटिमाते हुए आते दिखे तथा मानसरोवार में समाते हुए मेरे सहित सभी लोगों ने इस अद्भुत नजारे को देखे। उसके बाद में 4.30 तक उसी दृश्य को देखने की प्रतीक्षा किया किन्तु पुनः उक्त दृश्य देखेने को नही मिला, मैं वापस कमरे में आकर सो गया।


चूंकि आज भी हमें यही रूकना है इसलिए आराम से सोकर उठा, चाय नाश्ता किया। आज श्रावण सोमवार है इसलिए मानसरोवर से जल भरने के लिए उपयुक्त दिन मानकर जरीकेन/बाटल एवं पूजा सामग्री साथ में लेकर स्नान करने मानसरोवार की ओर गया। मानसरोवर के किनारे-किनारे मैं, राजनारायणजी, शास्त्रीजी (बंगलोर) ईश्वर भट्टजी (मंगलोर) बहुत दूर तक गए। तब तक धूप तेज हो गया, इसलिए वापस आते हुए किनारे रूककर स्नान की तैयारी किए। मानसरोवर में घर के सभी लोगो के नाम से डुबकी लगाया। मानसरोवर के जल के अन्दर से छोटे-छोटे पत्थर एकत्र किया स्नान कर पूजन नमन किया, जरीकेन/बाटल में जल भरा, मानसरोवर में स्नान करते समय कैलाश पर्वत एवं ओंकार मांधाता पर्वत के दर्शन किया।

(राजनारायणजी, शास्त्रीजी, भट्टजी और मैं) हम चारों स्नान कर जल भरने के बाद किनारे में एक स्थान पर बैठकर मानसरोवर ले जाने हेतु एकत्र जल का पूजन किए। पूजन पश्चात वापस गेस्ट हाऊस की ओर रवाना हुए।

मानसरोवर को स्वच्छ रखने के उद्देश्य से गन्दे सामान, प्लास्टिक आदि उसमें नहीं डाला जाता, उसी प्रकार साबुन का उपयोग नहाने, कपड़े धोने के लए नही किया जाता किन्तु आज स्नान करते समय श्री ईश्वर भट्ट (मंगलोर) द्वारा साबुन लगाकर नहाया गया, साबुन लगाने के बाद जैसे ही श्री भट्ट मानसरोवर में डुबकी लगाए उसके कुछ देर बाद उन्हे ध्यान आया कि उनका चश्मा मानसरोवर के पानी में ही गिर गया। काफी प्रयासकर खोजने के बाद भी

अन्ततः उनका चश्मा नहीं मिला, बिना चश्मा के उन्हें आगे गेस्ट हाऊस पहुंचने में असुविधा हुई तब श्री राजनारायण जी जो कि एक अतिरिक्त चश्मा रखे हुए थे उन्होने उन्हें दे दिया, तब वे कुछ राहत महसूस किए। इस घटना को सुधीपाठक जिस दृष्टि से देखे वह वैसा ही है ‘‘अर्थात चश्मा पहने हुए साबुन के उपयोग करने एवं पानी में डुबकी लगाने से साबुन के झाग की चिकनाई के वजह से चश्मा पानी में गिर गया, अथवा मानसरोवर के जल की शुद्धता एवं पवित्रता बनाए रखने के उद्देश्य से साबुन का उपयोग वर्जित होने के बावजुद जानबुझकर चाहे अनजाने में ही साबुन का उपयोग किया गया, जिससे तत्काल प्रताड़ना स्वरूप चश्मा मानसरोवर में ही खो गया।‘‘गेस्ट हाऊस पहुंचने के बाद 11.30 बजे दोपहर का भोजन किया एवं कल की यात्रा की तैयारी करते हुए लगेज पैक किया। दोपहर बाद मौसम में अचानक परिवर्तन हुआ व पानी गिरना प्रारंभ हो गया जो यात्री बाद में स्नान करने गए उन्हें जल्दी वापस आना पड़ा थोड़ी देर बाद बर्फ भी गिरना प्रारंभ हो गया, वातावरण एकदम ठण्डा हो गया सभी यात्री अपने-अपने कमरे में बैठे रहे। हमारे कक्ष में श्री ईश्वर भट्ट एवं बंगलोर के शास्त्री जी के आने के बाद हमारे द्वारा मानसरोवर से लाए गए पत्थर के टुकड़ों का श्री भट्ट द्वारा परीक्षण किया जाता रहा, शास्त्रीजी द्वारा जानकारी दी गई कि भट्ट जी पत्थर, रत्न एवं ज्योतिष के जानकार है। श्री भट्टजी द्वारा अपने पास रखे हुए पत्थर परखने का यंत्र (पतले धागे में बंधे हुए लोहे का गुटका) निकालकर यात्रियों के द्वारा लाए गए पत्थर का परीक्षण किया गया। उनके द्वारा धनात्मक पत्थर पास में रखकर शेष पत्थर फेंकने के लिए कहे जाने पर सभी यात्री ऐसा ही किए। मौसम थोड़ा साफ हुआ सभी लोग शाम 5.00 बजे चाय पिए। थोड़ी देर बाद टोमेटो सूप लिए। रात को आज रोटी, सब्जी खाये तत्पश्चात सोने का उपक्रम किए।


क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी
रायपुर

सोलहवें दिन की यात्रा दुलर्भ क्षणों की अनुभूति : 03.08.2008

03.08.2008 श्रावण सुदी 2 रविवार

Photobucketकल रात्रि भोजन के समय यात्रियों के बीच चर्चा हुई कि ब्रम्ह मुहुर्त में देवता तथा ऋषिगण विभिन्न स्वरूपों में मानसरोवर में स्नान करने आते है। इसलिए इस दुलर्भ क्षण का दर्शन यात्रियों को करना चाहिएं यही चर्चा हम लोग अपने कक्ष मे किए एवं तय हुआ कि 2.30-3.00 बजे रात्रि में जागकर मानसरोवर के किनारे हम लोग जाएगे, जिनकी नींद पहली खुलेगी वे अन्य लोगों को उठाएगें।


रात्रि लगभग 2.30 बजे मुझे भी चर्चा अनुसार मेरे कक्ष के सहयात्रियों द्वारा जगाया गया। मैं झटपट गरम कपड़े पहनकर तैयार हो गया फिर हम लोग भी टार्च लेकर गेस्ट हाऊस के बाहर आकर मानसरोवर के किनारे बने गोम्फा के पास आकर बैठ गए, हमसे पहले भी कुछ और यात्री यहां पर आ चुके थे। चारो तरफ अंधेरा, किन्तु आकाश में तारे टिमटिमाते हुए, हवा अत्यधिक ठण्डी एवं तेज बहती हुई, सुनसान वातावरण में गहरी शांति के बीच एकटक सामने मानसरोवर को निहारते हुए बैठे रहे। कुछ यात्री आपस में खुसुर-फुसुर भी करते रहे। लगभग 3.30 बजे आसमान से दो सितारे एक साथ आते हुए एवं मानसरोवर के जल में समाते हुए दिखाई दिये। सभी यात्रीगण सचेत होकर उसको देखे। उस घटना के बाद आधा घंटा तक मैं और वही पर बैठा रहा फिर 4.00 बजे वापस आकर सो गया।

Photobucketआज यही रूकना है इसलिए सबेरे 7.00 बजे सोकर उठा, हल्की धूप निकली हुई किन्तु ठण्डी पूर्ववत ही। नित्य क्रिया से निवृत हो चाय पीने डायनिंग (किचन) में गया, वहां आज नाश्ते में उपमा बना है। बंगलोर के यात्री श्रीमति शास्त्री द्वारा मेरे नाश्ते के लिए बिना प्याज वाला उपमा पृथक से तैयार किया गया था, जिसे उनके द्वारा दिया गया, नाश्ता किया, यात्रीगण तैयार होकर आते जा रहे थे, और उपमा का नाश्ता कर रहे थे। नाश्ता उपरांत चाय दिया गया। 9.00 बजे कुछ यात्रियों के साथ मानसरोवर के किनारे-किनारे काफी दूर तक पैदल गया, अन्य यात्रीगण भी पैदल मानसरोवर के किनारे चले जा रहे थे, बहुत दूर से कैलाश पर्वत कोहरे में ढंका हुआ दिखाई दे रहा था, मानसरोवर के पानी में सूर्य प्रकाश जैसे पड़ रहा था, वैसे-वैसे पानी का रंग हरा, काला, सफेद दिखाई दे रहा था। काफी दूर आगे जाने के बाद वापस हुए तब तक धूप कुछ तेज हो गया था एवं चलने से शरीर में गर्मी आ गई थी इसलिए किनारे में एक जगह रूककर मानसरोवर में स्नान किया। स्नान कर वापस गेस्ट हाऊस आया तब तक भोजन तैयार हो गया था दोपहर के भोजन में आज चांवल, पत्ता गोभी बनाया गया हैं भोजन किया थोड़ी देर धूप में ईधर-उधर टहलकर बिस्तर में आकर लेट गया। यात्रीगण आज आराम के मूड में थे। इसलिए कुछ लोग अभी स्नान करने जा रहे थे।

अपरान्ह 3.00 बजे गेस्ट हाऊस के बाहर गोम्फा के पास मानसरोवर के किनारे हवन पूजा का आयोजन गुजरात के यात्रियों द्वारा किया गया, उक्त हवन कार्यक्रम में हम सभी यात्री शामिल हुए। पूजन एवं हवन सामग्री पोरबंदर (गुजरात) के यात्री श्री अशोक भाई साथ में लेकर आए थे, पूजन का कार्य श्री प्रजापति द्वारा सम्पन्न कराया गया। सभी यात्री हवन में आहूति दिए। पूजन हवन लगभग 6.00 बजे समाप्त हुआ तदुपरांत सभी यात्रियों को प्रसाद के साथ चांदी के बने बेलपत्र दिया गया। आज रात्रि भोजन में केवल आलू भजिया व सूजी का हलवा तैयार किया गया है। शाम को जनरेटर चालू होने के बाद सभी यात्री आलू भजिया व सूजी का हलवा खाए। रात्रि में कमरे में सोने के समय पुनः ब्रम्हमुहुर्त में उठने का कार्यक्रम बनाए एवं सो गए।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर

पंद्रहवें दिन की यात्रा 02.08.2008 पवित्र मानसरोवर में स्‍नान :

02.08.2008 श्रावण सुदी 1 शनिवार


Photobucketसुबह 6.00 बजे उठा चाय पिया, पश्चात तैयार हुआ। आज नाश्ता में पोहा बना है, 7.00 बजे पोहा खाकर बोर्नबिटा पिया। यात्रियों के समुह ‘‘बी‘‘ जिस बस में मानसरोवर परिक्रमा पूर्णकर कैलाश परिक्रमा हेतु दरचन पहुंचेगी उसी बस से हमारा समुह ‘‘ए‘‘ मानसरोवर परिक्रमा हेतु रवाना होगा इसलिए कमरों से सभी यात्री अपना-अपना लगेज गेस्ट हाऊस के गेट के पास लाकर बस का इंतजार कर रहे थे। इसी बीच मैं पी.सी.ओ. आकर घर बात किया तथा मानसरोवर परिक्रमा हेतु रवाना होने की जानकारी दिया तथा यही जानकारी फोन पर श्री नरसिंह चन्द्राकर को भी दिया।

लगभग 9.00 बजे ग्रुप ‘‘बी‘‘ के यात्रियों को लेकर बस पहुंची दोनो समुह के यात्री एक दूसरे से मिलकर अपने-अपने यात्रा का अनुभव सुनाए। उनके द्वारा बस से सामान उतार लेने के बाद हम लोगों के द्वारा सामान बस में लादा गया, पश्चात ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष के साथ हमारी बस रवाना हुई लगभग डेढ़ घंटे की यात्रा के बाद हमारी बस एक छोटे से शहर में जाकर रूकी जिसका नाम 000 (होर) है। यहां के बाजार से आगे पड़ाव के लिए भोजन सामग्री एवं सब्जी वगैरह खरीदा गया। यहां के सड़क किनारे कुछ लोग बिलियर्ड खेल रहे थे। हम लोग घुमते हुए यहां के दुकान एवं उसमें बिकने वाले सामान तथा भाव का मुआयना कर रहे थे। यहां बताया गया कि निजी ट्रेव्हल एजेंसी के माध्यम से कैलाश मानसरोवर यात्रा पर आने वाले यात्री भारत से काठमाण्डू (नेपाल) तथा वहां से सड़क मार्ग से दरचन पहुंचते है। तब भी यह शहर ‘‘होर‘‘ रास्ते में पड़ता है ।
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काठमाण्डू से दरचन तक के सड़क का निर्माण कार्य चीनी सरकार द्वारा कराया जा रहा है। कही-कही पर डामरीकरण तथा कही-कही पर सीमेंटीकरण का कार्य प्रगति पर दिखाई दिया। होर में आवश्यक सामग्री खरीदने के पश्चात हम लोग पुनः बस द्वारा रवाना हुए, हमारी बस कुछ दूर जाने के बाद हमे मानसरोवर दिखाई देने लगा उसके बाद मानसरोवर के पास ही पहुंच गए, आगे रास्ता मानसरोवर के किनारे-किनारे ही गया है, जहां से हमारी बस गुजर रही थी दायें साईड में पास में मानसरोवर तथा दूर बायें तरफ ‘‘कैलाश‘‘ अभी भी दिखाई दे रहा था। और कुछ दूर जाने के बाद हमारी बस रूक गई हम सभी यात्री नीचे उतरे सड़क के किनारे ही बायी ओर बौद्धो के प्रार्थना स्थल ‘‘गोम्फा‘‘ है जहां अंदर जाकर दर्शन किए और सड़क के दायी ओर नीचे मानसरोवर के पास जाकर जल का स्पर्श, आचमन किया। पश्चात पुनः यात्रा प्रारंभ हुई। आगे के यात्रा में लगातार हमारी बस मानसरोवर के किनारे-किनारे ही जा रही थी रास्ता कच्चा एवं उबड़-खाबड़ है चारो तरफ हिमालय की पर्वत मालाएं है प्रायः सभी के शिखर हिमाच्छादित है।

Photobucketदोपहर लगभग हम लोग कुगु ;फनहनद्ध नामक स्थान पर पहुंचे यह स्थान दरचन से 127 कि.मी. दूरी एवं समुद्र सतह से 4500 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। हमारी बस मानसरोवर के किनारे बने गेस्ट हाऊसनुमा मकानों के पास जाकर रूकी वही पर मानसरोवर के निकट बौद्ध गोम्फा भी है। यात्रियों के रूकने की व्यवस्था चीन सरकार द्वारा यहां की गई है। प्रत्येक कमरे में 3-4 लकड़ी के तखत एवं उस पर गद्दे रजाई रखे हुए है। बस से सामान उतारकर एक कमरे में मैं, राजनारायण, रामशरण और राकेश जुनेजा अपना-अपना स्थान सुरक्षित किए। यहां पर कमरे दो लाईन में बनाए गए है। एक-एक लाईन में 6-6 कमरे है। दूसरे लाईन के कमरे की खिड़की से मानसरोवर दिखाई देता है, 9 कमरे में हम यात्री रूके व एक कमरे में बस ड्रायवर एवं गाईड रूके शेष दो कमरे गेस्ट हाऊस के इन्चार्ज अधिकारी के पास है। एक पृथक से झोपड़ीनुमा कमरे में किचन है तथा कुछ दूर पर 2-2 महिला पुरूष टायलेट (शुष्क) बना हुआ है। जो बहुत ही गंदा है। इस गेस्ट हाऊस का नाम 000000 0000 000 हैं इसके एक तरफ समय मौसम अनुसार विभिन्न रंग बदलने वाला पवित्र मानसरोवर झील तथा दूसरी तरफ हिमाच्छादित ओंकार मांधाता पर्वत है। जब हम बाकी यात्री अपना सामान उतार कर कमरों में व्यवस्थित कर रहे थे उतने अतरांल में ही महिला सहयात्रियों के द्वारा रसोईया के सहयोग से ‘‘मैगी‘‘ तैयार कर लिया गया। यात्रीगण ‘‘मैगी‘‘ खाए मैं केवल चाय पिया।

Photobucketपश्चात लगभग 2.00 बजे यात्रीगण मानसरोवर स्नान करने जाने की तैयारी करने लगे। हम लोग (राजनारायण, विक्रम, राकेश) भी मानसरोवर में स्नान करने हेतु गेस्ट हाऊस से बाहर निकलकर झील के किनारे-किनारे लगभग 1 कि.मी. जाकर एक स्थान पर रूक गए। तेज ठण्डी हवा चल रही थी, धूप भी तेज था, सभी एक-एक कर नहाने हेतु पानी में जा रहे थे। मैं भी पहली बार ‘‘मानसरोवर‘‘ में स्नान किया, मानसरोवर का पानी एकदम साफ, अत्यधिक ठण्डा हैं पानी में कमर तक गहराई में जाने पर भी नीचे सतह स्पष्ट दिखाई दे रहा था। पानी ठण्डा होने के बाद भी मानसरोवर में डुबकी लगाने पर असीम आनन्द की अनुभूति हुई कल सूर्यग्रहण पड़ा था इसलिए आज जनेऊ बदला। स्नान के दरम्यान देवी-देवता तथा सद्गुरू एवं पुरखों की याद आई। मानसरोवर में स्नान करते समय एक तरफ दूर में दिखाई दे रहे ‘‘कैलाश‘‘ तथा दूसरी तरफ ओर मांधाता पर्वत के दर्शन किया। मानसरोवर में स्नानकर अद्भुत अनुभूति प्राप्त गेस्ट हाऊस लौटे।

आज शाम को गुजरात के हमारे सहयात्रियों द्वारा भेल तैयार किया गया सभी यात्री आनन्द से चट्पटा भेल खाए किन्तु प्याज डाले जाने के कारण मैं नही खाया केवल नमकीन सेव खाया। शाम होने पर मानसरोवर किनारे खड़ा होकर सूर्यास्त देखा एवं कैलाश दर्शन किया। यहां भी जनरेटर से दो घंटे के लिए प्रकाश व्यवस्था किया गया, रात्रि के भोजन में चावल, सब्जी रोटी एव खाखड़ा तैयार किया गया सभी यात्री भोजन कर विश्राम किए। रात में मानसरोवर के किनारे बने गेस्ट हाऊस में हम 24 यात्री लगभग 10 सहयोगी सहित पास ही बने गोम्फा में निवासरत 16 लामा सहित कुल लगभग 50 लोग ही थे।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर


बारहवें दिन की यात्रा - यम द्वार पार कर श्री कैलाश पर्वत की ओर 30.07.2008

30.07.2008 श्रावण बदी 13 बुधवार


Photobucketसबेरे 5.30 बजे उठकर तैयार हुए। सभी यात्रियों का लगेज गेस्ट हाऊस के एक कमरें में ही रखा जा रहा था मैं भी अपना लगेज वही जाकर रख आया, चाय पिए। रास्ते के लिए तैयार किए गए बैग को लेकर बस में जा बैठा, ठीक 7.30 बजे बस आगे यात्रा के लिए रवाना हुई। हमारी बस पहाड़ी कच्चे रास्ते से होकर आगे बढ़ रही थी चारो तरफ सपाट बंजर भूमि नजर आ रही थी। दरचन से 10 कि.मी. आगे जाने के बाद बस रूक गई उस समय सुबह 9.00 बजे थे, हमें बताया गया कि बस इसके आग नहीं जाएगी, आगे का रास्ता पैदल एवं घोडे से तय करना होगा। सभी यात्री बस से उतर गए सामने मंदिरनुमा गेट बना हुआ था।

Photobucketइस स्थान का नाम ‘‘यमद्वार‘‘ बताया गया। मृत्यु के देवता यमराज के नाम से निर्मित यमद्वार को सभी यात्री पार किए अर्थात मृत्यु के देवता के पास से सकुशल पार कर मोक्ष दाता भगवान शिव के निवास स्थल ‘‘कैलाश‘‘ पर्वत के परिक्रमा हेतु आगे प्रस्थान किए। थोड़ी दूर पैदल चलने के बाद हम लोग 000000 ला-चू वॅली (घाटी) या भगवान के नदी की घाटी ; टमससमल व जीम त्पअमत व जीम हवकद्ध में प्रवेश किए। यहां पर हमें गाईड पोनी व पोर्टर मिले। यात्रियों के द्वारा अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार पोनी पोर्टर की मांग तकलाकोट में चीनी अधिकारियों को बता दिया गया था। उसी के अनुरूप यहां पोनी पोर्टर उपलब्ध थे। यात्रियों को पोनी एवं पोर्टर पर्ची (लॉट द्वारा) के माध्यम से मिलते जा रहे थे। मैं पोनी एवं पोर्टर दोनो मांग किया था इसलिए मेरे द्वारा दो (पोनी व पोर्टर) पर्ची निकाला गया। पर्ची के द्वारा पोनी मुझे श्रीजी तथा पोर्टर सोनल मिले। पोर्टर को बैग देकर मैं पोनी के सहयोग से उसके घोड़े में बैठ गया, उसके बाद पुनः हमारी कैलाश परिक्रमा यात्रा प्रारंभ हुई।
Photobucketयहां से हमे डेरापुक तक जाना है जिसकी दूरी 4 कि.मी. है तथा समुद्र सतह से 4890 मीटर ऊंचा है। लगभग दो घंटा यात्रा के बाद हम लोग एक स्थान पर चाय वगैरह पीने तथा क्षणिक विश्राम हेतु रूके। विगत दो घंटे के यात्रा के दरम्यान पुरा रास्ता हम लोग घाटी, नदी, पत्थर के चट्टान होकर गुजरे, चारो तरफ बर्फ से ढ़का हुआ पर्वत जो सूर्य प्रकाश पड़ने पर चमकता हुआ दिखाई पड़ रहा था रास्ते के दोनों ओर बाए एवं दाहिने ओर के पहाड़ी की चोटी बर्फ से ढकी हुई थी। इसलिए घाटी में बहने वाला हवा अत्यन्त ठण्डी थी। कुछ देर विश्राम करने के बाद पुनः यात्रा प्रारंभ किए और दोपहर 1.00 बजे के लगभग डेरापूक पहुंचे। यात्रियों के रूकने के लिए बनाए गए छोटे ऊंचाई के छत वाले मकानों में यात्रीगण रूकते जा रहे थे। हम लोग अर्थात मैं, मस्करा, विक्रम, तनेजा एवं रामशरन शर्मा जी एक ही कमरे मे रूके। पोर्टर से बैग लिया। वह जहां पोनी रूक रहे थे वहां जाकर रूका। जिस कमरे में हम लोग रूके उस कमरे की खिड़की से कैलाश के स्पष्ट दर्शन हो रहा था।

अलग टेण्ट में महिला यात्रियों के सहयोग से कुक द्वारा झटपट नाश्ता मैगी बनाने की तैयारी हो रही थी। मैगी का नाश्ता कर गुजरात के 8-10 यात्री पोरबंदर के श्री अशोक भाई के नेतृत्व में कैलाश दर्शन के लिए ऊपर पहाड़ी की ओर जा रहे थे। उन्ही के साथ राकेश जुनेजा एवं विक्रम भी जा रहे थे। लगभग 2.00 बजे चाय पीकर मैं व श्री राजनारायण जी भी उनके पीछे हो लिए। हमारे आगे-आगे आणन्द गुजरात के दम्पति भी चल रहे थे। हमारे कैम्प से ‘‘कैलाश पर्वत‘‘ नजदीक ही लग रहा था, जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जा रहे थे चढ़ाई भी खड़ी होती जा रही थी। साथ ही तेज ठण्डी हवा व धूप भी थी, कुछ दूर चढ़ने के बाद मेरी सांस फूलने लगी इसलिए रूक-रूक कर मैं आगे बढ़ने लगा।

हिमच्छादित कैलाश पर्वत में धूप पड़ने से बर्फ पिघलकर झरने के रूप में पहाड़ी के नीचे की ओर बह रही है जो क्रमशः आगे जाकर चौड़ी होती गई। इसमें बह रहा पानी अत्यन्त ठण्डा है। चढ़ते-रूकते अन्ततः मैं भी कैलाश पर्वत के समीप पहुंच गया। नजदीक से अवघड़ दानी, भूत भावन, भोले बाबा, शिव के वास स्थान ‘‘कैलाश पर्वत‘‘ का दर्शन, नमन एवं जल से आचमन कर धन्य महसूस किया। कैलाश के पास के चारो तरफ स्थित पर्वतों के शिखर पर बर्फ नही था केवल कैलाश के ही शिखर में बर्फ है लेकिन दूर स्थित सभी पर्वत श्रृखंला के शिखर बर्फ से ढके हुए है। कैलाश पर्वत के पत्थर ग्रेनाईट के सामान काले रंग है। शेष नजदीक के पहाड़ के पत्थर अलग किस्म के है।

Photobucket मौसम में अचानक बदलाव हुआ धूप के स्थान पर पानी गिरने जैसे बदली आ गई। मौसम के बदलाव को देखकर मैं, राजनारायणजी, जुनेजा एवं विक्रम धीर-धीरे वापस होने लगे। जाते समय चढ़ाई के कारण मैं थक गया था इसलिए उतरते समय अधिक सावधानी से पत्थरों पर पैर रखते हुए धीर-धीरे उतरा। हम लोग जब वापस आ रहे थे तो कुछ अन्य यात्री सहित श्री वी.पी. हरन भी नजदीक से कैलाश दर्शन हेतु मौसम का परवाह किए बिना ऊपर जाते हुए मिले। लगभग सायं 6.00 बजे हम लोग वापस कैम्प पहुंचे पानी गिरना भी प्रारंभ हो गया। जिसके कारण ठण्डी बढ़ गई। कमरे में आकर रजाई ओड़कर लेट गए एवं खिड़की से कैलाश पर्वत का दर्शन करते हुए बर्फ एवं पानी गिरते देखते रहे। मौसम खराब होने के कारण जो यात्री कैलाश पर्वत के नजदीक से दर्शन हेतु पहाड़ी में ऊपर गए थे वे भी जल्दी-जल्दी वापस आ गए। 7.00 बजे जनरेटर से प्रकाश व्यवस्था किया गया। पानी गिरते में ही डायनिंग (टेंट) में जाकर खिचड़ी खाए एवं वापस आकर रजाई में दुबककर पड़े रहे। पानी रात को भी गिरता रहा है।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर

ग्‍यारहवें दिन की यात्रा - राक्षस ताल व मानसरोवर से साक्षातकार 29.07.2008

29.07.2008 श्रावण बदी 12 मंगलवार 
Photobucketआज 5.00 बजे सुबह उठकर तैयार हुए। 5.30 बजे नाश्ता के लिए डायनिंग हॉल गए। नाश्ते में टोस्ट, ब्रेड, जैम, फ्राई फल्लीदाना एवं चाय दिया गया। नाश्ता उपरांत गेस्ट हाऊस के कमरे से लगेज दो बार करके नीचे बस तक लाया। हल्की बूंदाबादी हो रही थी। लगेज बस में चढ़ाया गया पश्चात तालपत्री से ढ़का गया। 7.00 बजे (भारतीय समय) एक बस एवं एक लेण्ड क्रुजर में सवार होकर ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष के साथ यात्रा प्रारंभ हुई मैं बस में बैठा तकलाकोट शहर एवं उसके कुछ दूर तक डामर रोड मिला । पश्चात कच्चा उबड़-खाबड़ रास्ता प्रारंभ हो गया। निर्जन, वीरान एवं बंजर भूमि हल्की पहाड़ी तथा सपाट मैदान से होकर हमारी बस जा रही थी दूर-दूर तक हरियाली नजर नही आ रही थी। रोड का निर्माण कार्य प्रगति पर दिखा कही-कही डामरीकरण कार्य होते हुए दिखाई दिया, मजदूर ,बुलडोजर, ट्रेक्टर आदि काम पर दिखे। लगभग 9.00 बजे हमारी बस एवं जीप एक बड़ी सी झील के किनारे जाकर रूक गई जो कि हमारे बांयी ओर में आया। हम सभी यात्री नीचे उतरे, बस से नीचे उतरते ही तेज ठण्डी हवा महसूस किया गया।
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बस में हमारे साथ चीन सरकार की ओर से अधिकृत तिब्बत एवं इंग्लिश भाषा जानने वाला गाईड भी मुहैया कराया गया। उनके द्वारा इस झील का नाम राक्षसताल बताया गया मान्यता है कि रावण द्वारा इसी झील के किनारे बैठकर भगवान शिव की कठिन तपस्या किया गया है। इसलिए इस झील को ‘‘रावण ताल‘‘ या राक्षसताल भी कहते हैं झील से काफी दूर एक पहाड़ी बर्फ से ढ़का हुआ दिखाई दे रहा था उक्त हिमाच्छादित पर्वत को कैलाश पर्वत बताया गया। अब तक के यात्रा के दौरान कैलाश पर्वत के सर्वप्रथम दर्शन यहीं से हुआ। गुजरात निवासी कुछ यात्री श्री अशोक भाई के नेतृत्व में जाकर झील में स्नान भी किए। कुछ लोगों ने जल का स्पर्श किया तथा मेरे सहित कुछ लोग राक्षसताल के नजदीक भी नही गए। दिल्ली के यात्री श्री राकेश द्वारा बताया गया कि झील के बीच में स्थित टापू (द्वीप) में अभी भी कई लामा निवास करते है व साधना तथा तपस्या में लीन रहते हैं आधा घंटा रूकने के पश्चात हमारी बस राक्षसताल के किनारे-किनारे आगे बढ़ी कुछ दूर आगे जाने के बाद हमारी दाहिनी तरफ थोड़ी दूर मे बड़ा सा झील दिखाई दिया जिसे मानसरोवर झील बताया गया।

Photobucketहमारी बस आगे बढ़ती ही जा रही थी मानसरोवर लगातार दाहिनी तरफ दिखाई दे रहा था किन्तु आगे बांयी ओर दिखाई पड़ रहे राक्षसताल का दिखना बंद हो गया। मानसरोवर के पानी में सूरज की किरणे पड़ रही थी जिससे वह चमकीला दिखाई पड़ रहा था मानसरोवर के किनारे-किनारे दूर में हिमाच्छाादित लंबा पर्वत श्रृखंला लगातार दिखाई दे रहा था। दोनों झील के बारे में बताया गया कि मानसरोवर यदि सूर्य और प्रकाश है तो राक्षस ताल चन्द्रमा और रात का अंधेरा है। लगभग 10.30 बजे हमारी बस ‘‘कीहू‘‘ नामक स्थान पर यात्रियों के लिए बने गेस्ट हाऊस के पास ही रूकी। सामने मानसरोवर दिखाई दे रहा था। हमे सूचित किया गया कि ग्रुप ‘‘बी‘‘ के यात्री यही उतरेगें इसलिए वे अपना लगेज बस से उतार लेवे। चूंकि मैं ग्रुप ‘‘ए‘‘ में शामिल था, इसलिए सामान उतारने की आवश्यकता नही पड़ी, कुछ यात्री सामने मानसरोवर की ओर जा रहे थे मैं भी उन्ही के साथ वहां तक पहुंच गया एवं पहली बार मानसरोवर के पवित्र जल को स्पर्श किया एवं अपने ऊपर छिड़का पश्चात पुनः वापस बस के पास आ गया। तब तक यहां रूकने वाले यात्री अपना सामान उतार चूके थे। पहले मानसरोवर परिक्रमा करने वाले यात्रियों को ‘‘कीहू‘‘ में उतारकर ग्रुप ‘‘ए‘‘ के 23 यात्री पुन‘ बस में सवार हुए पश्चात आगे दरचन के लिए रवाना हुई।


तकलाकोट से ‘‘कीहू‘‘ की दूरी 98 कि.मी. है तथा यहां से दरचन की दूरी 42 कि.मी. है। जो समुद्र सतह से 5182 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। जहां पर हमारे ग्रुप के यात्रियों को उतरना है। दरचन के रास्ते में हिमालय में अनेक हिमाच्छिदत छोटे-छोटे पर्वत दिखाई दिए। लगभग 12.30 बजे हम लोग दरचन पहुंचे हमारी बस बांऊण्ड्रीवाल से घिरा हुआ भवन के पास जाकर रूकी कैलाश यात्रियों को इसी गेस्ट हाऊस में रूकवाया जाता है। बस के रूकते ही हम लोग अपना-अपना लगेज उतार कर गेस्ट हाऊस में दाखिल हुए। सभी कमरे में प्रायः 3-3 बेड लगे हुए थे। उसमें से एक कमरे में, मैं मस्करा व विक्रम रूके। सभी कमरे अटैच लेट-बाथ वाला था किन्तु बाथरूम में ताला लगा हुआ था पूछने पर बताया गया कि पानी नही होने से गंदा है, यात्रियों के लिए बाहर सार्वजनिक शौचालय की व्यवस्था है किन्तु वह भी फ्लैश युक्त नही होने के कारण काफी गंदा था। इतना गंदा शौचालय शायद मैं पहली बार देखा। अनुमान है कि जब से बना है, तब से गंदगी साफ ही नही किया गया है। हमारे साथ के यात्री दिल्ली के राकेश जुनेजा द्वारा बताया गया कि कुछ वर्ष पहले वे कैलाश यात्रा पर आए थे तो शौच हेतु बाहर मैदान में जाना पड़ता था। कमरे में सामान रख बाहर आए। पास ही पी.सी.ओ. देखकर घर बात किया अन्य यात्री भी वहीं पर से बात कर रहे थे।

हमारे साथ के महिला यात्रियों के द्वारा तकलाकोट से साथ लाए गए रसोईए के सहयोग से दोपहर के भोजन पकाने की तैयारी किचन में की जा रही थी। 1.30 बजे भोजन तैयार होने की सूचना पर भोजन हेतु गए। चांवल और सब्जी पकाया गया जिसे सभी भरपेट खाए। साय. 3.00 बजे दरचन के स्थानीय बाजार घुमने गए। प्रायः सभी दुकानों के मालिक तिब्बती महिला ही थी। खाने-पीने के सामान के अलावा अन्य सभी सामानों के भाव में मोल-तोल बहुत किया जा रहा था। आसमान से कोहरा छटने पर दूर पहाड़ों के बीच में शाम को लगभग 5.00 बजे गेस्ट हाऊस से कैलाश पर्वत के दर्शन हुए।

कैलाश परिक्रमा की कुल दूरी 48 कि.मी. है जिसमे तीन दिन और दो रात गुजारकर पुनः इस गेस्ट हाऊस में आना है इसलिए परिक्रमा के दौरान तीन दिन के लिए पृथक से सामान का बैग तैयार कर शेष लगेज गेस्ट हाऊस में छोड़े जाने का निर्देश होने पर सभी यात्री तद्नुसार अपना-अपना सामान लगेज तैयार किए। रात के खाने में आज महिला सहयात्रियों के द्वारा खिचड़ी बनाया गया। अचार-पापड़ के साथ खिचड़ी का आनन्द सभी यात्री डिनर में लिए। प्रकाश व्यवस्था यहां भी जनरेटर से की जा रही थी इसलिए सभी यात्री जल्दी अपने-अपने कमरें में जाकर सो गए।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर

दसवें दिन की यात्रा चीनी मार्केट की सैर 28.07.2008

28.07.2008 श्रावण बदी 10/11 सोमवार

सुबह आराम से सोकर उठे। पहले श्री मस्करा जी स्नान किए तत्पश्चात मैं स्नान किया। 8.00 बजे नाश्ता के लिये बुलाया गया हम लोग नाश्ता के लिए डायनिंग हॉल में पहुंचे। कुछ यात्री हमसे पहले पहुंच गए थे। नाश्ता टेबल में लगाया गया था। नाश्तें में ब्रेड, जेम, टोस्ट, मक्खन, फ्राई मुंगफली दाना और चाय दिया गया। नाश्ता उपरांत छोटी मिटिंग हुई जिसमें बताया गया कि आगे की यात्रा हेतु पोनी पोर्टर की आवश्यकता नोट करा देवें ताकि उसी के अनुरूप चीनी अधिकारियों को मॉग नोट कराई जाएगी। उसी प्रकार उन्हें भुगतान देने तथा अन्य खर्चे हेतु यहॉं युवान (चीनी मुद्रा) लगेगा अतः यात्रीगण आवश्यकतानुसार डालर के बदले युवान एक्सचेंज करा लेवें। सुविधा के लिए यात्री अपने डॉलर चेन्नई के यात्री श्री पंचनाथन के पास जमा करे, जो कि बैंक से एकसाथ एक्सचेंज करा देगें। मैं युवान लेने के लिए 200 डालर जमा किया। बाजार जाकर पी.सी.ओ. से घर बात किया फिर घुमते हुए कुछ सामान (मास्क) खरीदकर वापस गेस्ट हाऊस आए।
लगभग 11.00 बजे भोजन का बुलावा आया लंच में चावल/सुप/उबला गोभी परोसा गया। चावल, गोभी खाया, सुबह युवान के लिए 200 डालर जमा किया था एक्सचेंज उपरांत 1350 युवान वापस मिला (1 डालर-6.75 यूवान) मेरे द्वारा पोनी एवं पोर्टर दोनो की मॉंग सुबह नोट कराई गई थी। जिनके लिए अग्रिम पोनी के लिए प्रतिदिन 270 यूवान के दर से 810 यूवान तथा पोर्टर के लिए प्रतिदिन 120 यूवान के दर से 360 यूवान कुल 1170 यूवान तीन दिन के लिए लाईजिंग ऑफिसर के पास जमा किया। श्री मस्करा जी केवल पोर्टर के लिए राशि जमा किए पश्चात वापस कमरे में आकर आराम किए। तकलाकोट से आगे की यात्रा कल प्रारंभ होनी है जिसके लिए लाइजिंग ऑफिसर द्वारा हम 46 यात्रियों के दो ग्रुप बनाए गए। ग्रुप ‘‘ए‘‘ कैलाश परिक्रमा पहले करेगा फिर मानसरोवर परिक्रमा करेगा उसी प्रकार ग्रुप ‘‘बी‘‘ मानसरोवर परिक्रमा पहले करेगा उसके बाद कैलाश परिक्रमा करेगा। ग्रुप ‘‘ए‘‘ के लिए लाइजिंग ऑफिसर श्री हरन तथा ग्रुप ‘‘बी‘‘ के लिए दिल्ली के यात्री श्री लांबाजी टीम लीडर नामजद किया गया। पहले कैलाश परिक्रमा में जाने वाले ग्रुप ‘‘ए‘‘ में टीम लीडर श्री हरन के अलावा श्री राकेश जुनेजा, विक्रम (दिल्ली), मस्करा, सुरेश, परेश भाई, भूपेन्द्र प्रजापति, एन.आर. मोदी (अहमदाबाद), नरसिह नारायण जोशी, अशोक भाई (पोरबंदर) रामशरण (चंडीगढ़), मोनषर्शा दम्पति (आणन्द), जी.एऩ शास्त्री व श्रीमति एन.जी. शास्त्री (बंगलौर), ईश्वर भट्ट (मंगलोर), श्रीमाता (बंगलोर), श्रीमति कुलकर्णी (पूणे), विपिन वाढेर (राजकोट), बाकुला बेन, किशोर कुमार पटेल (सूरत) बालकिशन (बड़ोदरा) एवं मैं स्वयं उसी प्रकार पहले मानसरोवर परिक्रमा में जाने वाले ग्रुप ‘‘बी‘‘ में टीम लीडर श्री लांबा के अलावा सर्वश्री भरत भट्ट, डॉ. भावसर (मुबंई), मानसिंग वर्मा (अहमदाबाद), सयाली देवघर, पूजा साठे, जे.डी. दातार (पूणे), देवजीभाई पटेल, नाथी बेन पटेल (सांवरकांठा गुजरात), एस. टांडवन, अरावली टांडवन (तमिलनाडु) जी वेंकटेश (बंगलोर), कमला, कुसुम बंसल, अशोक गुप्ता (दिल्ली), एस. बाला जी (चेन्नई), बी.आर. जर्नादन ( बंगलोर), रूबी (जम्मू), नंदन देशपांडे (पूणे), रामचद्रंन पंचनाथन, जे. नंदगोपाल (चेन्नई) एस. सुबैया (गंुटुर) यात्री तय किए गए।
दोपहर को थोड़ा सा आराम करने के बाद हम लोग पुनः बाजार गए। सबेरे जिस दुकान पर जाकर टेलीफोन से घर बात किया था वहीं से पुनः घर बात किया तथा यात्रा के दौरान कैलाश परिक्रमा में पहले जाने की बात बताया। यात्रा के दौरान तकलाकोट सकुशल पहुंचने एवं कल से कैलाश परिक्रमा एवं तत्पश्चात मानसरोवर परिक्रमा यात्रा में रवाना होने की जानकारी फोन से सर्वश्री ब्रम्हचारी सुबुद्धानन्दजी ब्रम्हचारी ब्रम्ह विद्यानन्दजी, स्वामीसदानन्द सरस्वती, स्वामी, अविमुक्तेश्वरानन्द सरस्वती, पं. राजेन्द्र शास्त्री, ज्ञानेश शर्मा, योगेन्द्र शंकर शुक्ला, नरसिंह चन्द्राकर एवं भैया रविन्द्र चौबे को दिया। जवाब में मुझे सभी से आगे की सफल यात्रा के लिए आशीर्वाद प्राप्त हुआ। ठंडी हवा तेज चलना प्रारंभ हो गया था, अन्य सहयात्री भी बाजार भ्रमण कर रास्ते के लिए आवश्यक सामान (टाफी, चाकलेट आदि) की खरीदी कर रहे थे एवं पी.सी.ओ. से टेलीफोन भी कर रहे थे। हम लोग 5.00 बजे गेस्ट हाऊस वापस आ गए। शाम 5.30 बजे (चीनी समय 7.30 बजे) डिनर के लिए बुलावा आ गया। डिनर में चावल/सूप/ऊबला आलू/ऊबला पत्ता गोभी दिया गया।

कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान चीन सरकार द्वारा यात्रियों को रूकने की व्यवस्था, तथा खाना बनाने हेतु बर्तन व गैस सहित चुल्हा की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। भोजन सामग्री एवं रसोईया का इंतजाम यात्रियों को स्वयं करना होता है, इसलिए तकलाकोट से दो ग्रुप हेतु दो रसोईया का सामूहिक व्यय पर इंतजाम किया गया। दिल्ली से यात्रा में रवाना होने के पूर्व हम 46 यात्रियों के लिए 10 दिन का राशन सामग्री एवं दो बैग मेडिकल कीट दिल्ली के पंजीकृत संस्था कैलाश मानसरोवर यात्रा समिति द्वारा प्रदाय किया गया था जिसका दो हिस्सा गु्रप ‘‘ए‘‘ एवं ‘‘बी‘‘ के लिए तैयार किया गया। रात को वापस कमरे में आकर खुद का लगेज पैक किए एवं टी.वी. देखते हुए सो गए।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर

नवें दिन की यात्रा - 27.07.2008

27.07.2008 श्रावण बदी 9 रविवार

Photobucketनवीढ़ांग से ‘‘लिपुलेख पास‘‘ तिब्बत (चीन) सीमा की दूरी यद्यपि 7 कि.मी. ही है किंतु समुद्र सतह से 5334 मीटर (16500 फीट) ऊचाई में होने के कारण अत्यधिक ठंडी तथा तेज हवा चलती रहती है। इसके साथ ही भारतीय समय के अनुसार 5.30 बजे सुबह बार्डर पार करना निर्धारित होने से सभी यात्री यात्रा प्रारंभ करने के लिए रात्रि 1.30 बजे ही उठ गए। सभी को डोम में चाय लाकर दिया गया। रात को हल्की बारिश हुई है अभी भी बूंदा-बांदी हो रही है जिसके कारण मौसम एकदम सर्द हो गया है मौसम को देखते हुए गर्म कपड़े पहनकर पैदल यात्री ठीक रात को 2.00 बजे ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष के साथ रवाना हुये। घोड़े वाले यात्रियों को 3.00 बजे रवाना होना है। इसलिए मैं भी मेरे पास उपलब्ध अधिकतर गर्म कपड़े (इनर, बनियान, बनियान, फूलइनर, फूलस्वेटर, ट्रेक सूट, विंडचिटर, रेनकोट, ऊनी दस्ताना, चमड़े का दस्ताना, सूती मोजा, ऊनी मोजा, मफलर, मंकी कैप) पहनकर तैयार हुआ। मेरा पोर्टर राजेश आ गया उसे बताया गया कि गर्म कपड़ा निकालकर लगेज पुनः पैक कर दिया हूं जिसे खच्चर में ढ़ोया जाना है । उसे वह उस स्थान पर छोड़ने के लिये ले गया है। वापस आ कर मेरा बैग ले लिया। पश्चात अन्य यात्रियों के साथ ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष कर पैदल रवाना हुआ।

बाहर धुप्‍प अंधेरा है, रिमझिम बारिश हो रही है, सभी यात्री एक हाथ में लाठी एवं दूसरे हाथ में बड़ा टार्च लेकर चल रहे है, ऐसा लग रहा है जैसे रात में मशाल जूलूस निकला हो। थोड़ी देर पैदल चलने के बाद घोड़ेवाला मिल गया, जहां से मैं घोड़े में यात्रा शुरू किया । लगभग 1 घंटे के खड़ी चढ़ाई में चलने के बाद सभी यात्री रूके वहां पूर्व के पैदल यात्री भी पहुंच गये थे। थोड़ी देर विश्राम करने के बाद पुनः सभी यात्री एकसाथ बार्डर की ओर रवाना हुए। जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे ठंड और हवा दोनों बढ़ती जा रही थी और सांस फूलने की वजह से रूक-रूककर पैदल चलना हो पा रहा था। लगभग सुबह 6.00 बजे हम लोग लिपुलेख पास (दर्रे) के पास पहुंचे अंधेरा छट गया था उजाला हो रहा था, टार्च की आवश्यकता नही रह गई थी, हमारे साथ चल रहे पोनी एवं पोर्टर यही पर रूक गये। उन्हे क्रमशः 3350.00 एवं 3300.00 रू. भुगतान किया एवं यात्रा से वापसी पर पुनः आने को कहकर पोर्टर से बैग लेकर मैं लिपुलेख सीमा की ओर बढ़ गया पथरीले रास्ते में जहां-तहां बर्फ जमा हुआ था। जिसे पार करते हुए सभी यात्री आगे बढ़ रहे थे। कुछ कदम चलने पर ही सांस भर जा रहा था। बार्डर पर पहुंचकर यात्रीगण थमते जा रहे थे। आईटीबीपी जवान तथा हमारे साथ चल रहे विदेश मंत्रालय के अधिकारी श्री हरन एकदम आगे पहुंचकर शेष यात्रियों का इंतजार कर रहे थे।

Photobucket10-15 मिनट में सभी 46 यात्री वहां पहुंच गये। उधर सीमा पर चीनी सैनिक एवं अधिकारी रेनकोट पहने हुए एवं छतरी लिये खढ़े होकर हमारा इंतजार कर रहे थे श्री हरन द्वारा चीनी अधिकारियों की कैलाश यात्रियों की सूची ग्रूप वीजा सहित सौंपा गया। चीनी अधिकारी के द्वारा अपना छोटा ब्रीफकेस खोलकर भी एक सूची निकाली गई जिससे इस सूची का मिलान किया गया। सूची में समान नाम होने पर सिर हिलाकर ओके किया गया। फिर सूची में उल्लेखित क्रम के अनुसार अनुक्रमांक और नाम पुकारा जाना लगा। तद्नुसार यात्रीगण आगे आते गये एवं अपना-अपना पासपोर्ट चीनी अधिकारियों को देकर आगे सीमा में प्रवेश करते गये। मेरा नाम उक्त सूची में दसवें क्रम में था। मेरा नं. आने पर मैं आगे बढ़ा, पासपोर्ट निकालकर मैं चीनी अधिकारी को सौंपा, पासपोर्ट खोलकर फोटो से चहेरा देखकर मिलान किया गया। तद्पश्चात पासपोर्ट पास ही खड़े एक अधिकारी के द्वारा रखे गये ब्रीफकेस में डालते हुए मुझे ओके कहकर आगे बढ़ने का इशारा किये । मैं जैसे ही आगे बढ़ा वहां पर खड़े चीनी सैनिकों एवं अधिकारियों द्वारा ‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ के उद्घोष कर स्वागत किया गया। चीनी सीमा में पहुंचकर अन्य सब यात्री का इंतजार करते एक स्थान पर खड़े होते जा रहे थे।

हल्की बारिश के साथ स्नोफाल भी हो रहा था, जिससे ठंड और बढ़ गई इसी समय चीन के तरफ घोड़े में तथा उसके बाद पैदल ‘‘कैलाश मानसरोवर परिक्रमा‘‘ पूर्ण कर भारतीय यात्रीगण भारत सीमा में प्रवेश करने के लिये आते जा रहे थे। कुछ देर एक स्थान में खड़े रहने से ठंड से शरीर में कपकपाहट शुरू हो गई थी, इसलिये घोड़े का इंतजार न कर धीरे-धीरे पैदल ही आगे बढ़ना 7.30 बजे प्रारंभ किये । चीनी सीमा में यात्रा एकदम ढ़लान वाला है, रास्ता पूर्णताः पथरीला हैं, पेड़-पौधे आदि का नामो निशान नही है। बंजर पथरीला संकरा ढ़लान है, जिसमें कही-कही पर बर्फ जमा हुआ है। कैलाश मानसरोवर यात्री एवं उनके समान को लेकर घोड़े खच्चर वाले चीन तरफ से सीमा की ओर आ रहे थे। इसलिये तत्काल घोड़े मिलने की संभावना न देखर हम लोग पैदल लगभग 3 कि.मी. तक आगे आ गये। तब तक धूप भी निकल आया था। जिसके कारण कपकंपाने वाली ठंड कम हो गई थी किन्तु हवा बहुत तेज चल रही थी बार्डर से घोड़ो को खाली वापस आते हुए देखकर हम लोग धूप में ही एक स्थान पर बैठ गये बार्डर की ओर से कुछ घोड़ों में हम लोगो का लगेज लादकर चीनी पोनी आ रहे थे जो हमारे साथी यात्री जिनका क्रम आखिरी में बार्डर पार करने का आया वे वही से घोड़े में बैठकर आ रहे थे। हम लोग खाली घोड़ो के पास आते तक उसका इंतजार करते रहे, जैसे घोड़े आते गये हम लोग सवार होकर आगे बढ़ते गये।

Photobucketघोड़ों के द्वारा लगभग 4 कि.मी. चलने के बाद उस स्थान पर पहुंचे जहां पर खाली बस हमारा इंतजार कर रही थी एक बड़ी बस एवं लैण्ड कजर जीप में समान सहित सवार होकर हम लोग रवाना हुए लगभग 8-10 कि.मी. उबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते में बस द्वारा सफर करने के बाद हमारी बस चीनी सेना के कैम्प के पास पहुंची चीनी अधिकारियों द्वारा उतरकर वहां औपचारिकता पूर्ण की गई तत्पश्चात हमारी बस पुनः रवाना हुई। कुछ देर में लगभग 11.30 बजे हम लोग एक शहर में पहुंचे जिसका नाम तकलाकोट (पुरंग) है यह चीन (तिब्बत) सीमा का एक छोटा शहर है। हमारी बस एक कैम्पस में दाखिल हुई सामान आदि उतारकर हम लोग हॉल में पहुंचे। कुछ देर में हमें उक्त गेस्ट हाऊस में कमरा आबंटित किया गया। रूम नं. 204 में मैं और श्री राजनारायण मस्करा रूके। जहां हमें रूकवाया गया वह गेस्ट हाऊस काफी अच्छा है। सभी रूम अटैच बाथरूम वाला है। जिसमें गीजर लगे हुए है। पहले मस्करा जी स्नान किए पश्चात मैं स्नान (तीसरे दिन) किया। 11.45 बजे दोपहर भोजन का बुलावा आ गया। कपड़े बदलकर डायनिंग हॉल मे गए वहां सलाद, उबला हुआ चांवल व सूप रखा हुआ था। डिनर प्लेट/चम्मच लेकर यात्रीगण लाइन लगाकर चीनी महिला कर्मचारी द्वारा परोसे जा रहे लंच लेकर डायनिंग टेबल में बैठकर भोजन किये। लंच के दौरान बताया गया कि इमीग्रेशन फार्म भरकर अभी देना है। सभी यात्री लंच के बाद वही पर फार्म भर जमा किए। कुछ देर बाद हमारा पासपोर्ट वही डायनिंग हॉल में ही वापस मिल गया।

वापस कमरें में आकर सामान व्यवस्थित किए कुछ देर आराम करने के बाद गेस्ट हाऊस के बाहर आए। सड़क के दोनो ओर किनारे दुकाने बनी हुई है, सभी दुकानों में चीन भाषा में र्बोड लगे हुए है। सभी दैनिक वस्तुओं की दुकानो के अलावा मटन मांस/विदेशी शराब के दुकान भी देखने को मिले। छोटे-छोटे दुकान भी देखने को मिले जहां पर केवल चीनी सामान ही दिखें। सर्वप्रथम मैं और मस्करा जी एस.टी.डी. गए वहां का मालिक तिब्बती है जो थोड़ा बहुत हिन्दी और अंग्रेजी समझता है बाकी इशारे से बात हुई हम लोग अपने-अपने घर बात किए इसके अलावा एक दो जगह और बात किए। यहां टेलफोन से बात करने का चार्ज प्रतिमिनट 20.00 रू. लिया गया। यद्यपि यहां डॉलर अथवा येन (चीनी मुद्रा) स्वीकार किया जाता है किन्तु दुकानदार तिब्बती होने के वजह से तथा कैलाश यात्री भारतीय आते रहने के वजह से वह रूपये भी ले लिया। भारतीय रूपये 6.50 के बराबर एक येन चीनी मुद्रा यहां बताया गया। भारतीय समय से यहां का समय 2.30 घंटा आगे है। अभी भारतीय समय के अनुसार 4.00 बजे है तो चीनी समय के अनुसार 6.30 बज गए थे। श्री मस्कराजी द्वारा अपने घड़ी में चीनी समय के अनुसार मिलान किया गया। धूप थी किन्तु हवा ठण्डी थी रात को नींद पूरी नही हुई थी इसलिए हम लोग आराम करने के वजह से गेस्ट हाऊस वापस आ गए। लगभग सभी सहयात्री दोपहर के भोजन के बाद यहां के बाजार में घूम रहे थे। शाम 5.00 बजे (7.30 बजे) डिनर का बुलावा आ गया। नीचे डिनर हॉल में जाकर डिनर लिए थोड़ा सा टहलते हुए वापस कमरे में आए ।

कमरें की खिड़कियों में डबल कांच लगी हुई थी जिससे हवा कमरे में बिल्कुल नहीं आती। कमरा में पंखा नही लगा था खिड़की खोलने से तेज ठण्डी हवा का झोंका आया। इसलिए कांच बदंकर सोने की तैयारी किए। टी.वी. चालू करने पर चीनी भाषा में कार्यक्रम आ रहे थे किन्तु एक सप्ताह बाद ओलम्पिक की शुरूवात होने वाली थी इसलिए ओलम्पिक सम्बन्धित जानकारी देखते रहे। थोड़ी देर में नींद आ गई।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर

आठवें दिन की यात्रा - 26.07.2008

26.07.2008 श्रावण बदी 8 शनिवार

Photobucketकालापानी से नबीढ़ांग की दूरी 9 कि.मी. तथा समुद्र सतह से ऊंचाई 4246 मीटर है .सबेरे 5.30 बजे नींद खुली, चाय पी। काफी तेज एवं ठण्डी हवा चल रही थी मैंने स्नान नहीं किया। कुछ यात्रियों ने गरम पानी से स्नान किया। सभी यात्री तैयार होकर 7.30 बजे डायनिंग हॉल में नाश्ते के लिए पहुंच गए। नाश्ते में आज पूड़ी, छोले दिया गया। यात्री-गण नाश्ते के उपरांत बोर्नविटा लेकर यात्रा प्रारंभ की। कैम्प से लगभग 1 कि.मी. आगे पोनी एवं पोर्टर रात्रि में रूके थे। वहां तक पैदल जाकर आगे घोड़े से यात्रा की। दो ढ़ाई घंटा चलने के बाद आईटीबीपी द्वारा निर्धारित चाय स्थल मैं पहुंचे। आलू चिप्स के साथ चाय लेते हुए सभी यात्रियों ने कुछ देर विश्राम किया।
Photobucketनवीढांग के रास्ते में हरियाली कम दिखी किन्तु घाटी में रंग-बिरंगी फूल जरूर दिखे। सुबह से ही हवा ठण्डी एवं तेज चल रही थी। इसलिए कल की अपेक्षा आज ज्यादा गरम कपड़े सुबह से ही पहनकर, सिर में मैं मंकी कैप तथा हाथ में ऊनी दस्ताने पहन लिया था। नवीढ़ांग के रास्ते में लगभग चारों तरफ बर्फ से ढ़ंकी हुई पहाड़ी चोटी दिखलाई दे रहे थे। जिसके आसपास काफी कोहरा भी था। लगभग 11.30 बजे मैं ‘‘नवीढ़ांग‘‘ पहुंच गया पहुंचते ही रसना से स्वागत किया गया। यात्रियों के लिए निर्धारित डोम में छोटे कैलाश यात्री दो दिन पूर्व से ही रूके हुए थे। यात्री छोटे कैलाश यात्रा के रूट में शामिल नवीढ़ांग में ‘‘ओम पर्वत‘‘ के दर्शन के लिए आए थे। विगत दो दिन से घने कोहरे से ढ़के होने के वजह से ‘‘ओम पर्वत‘‘ के दर्शन नहीं कर पाए थे। अतः चूंकि कैलाश यात्री का पहुंचना प्रारंभ हो गया था इसलिए अब वे भोजन उपरांत धीरे-धीरे कैम्प खाली कर कालापानी के लिए वापस हो रहे है। उनके द्वारा खाली करने के उपरांत उसी डोम में हम लोग रूक रहे थे।
Photobucketआज जिस डोम में हम लोग (मैं स्वयं, मस्करा, तनेजा, विक्रम) रूके वह अपेक्षाकृत बड़ा है। इसमें लगभग 20 यात्री रूक सकते है। यहां के डोम में रूकने की व्यवस्था लकड़ी के तखत न होकर नीचे में ही गद्दे बिछाकर किया गया था। रूकने की जगह सुनिश्चित कर दोपहर का भोजन किए। जिस स्थान पर यात्रियों के रूकने के लिए व्यवस्था बनाया गया है उसके ठीक नीचे आई.टी.बी.पी. जवानों के कैम्प है। कैम्प के ठीक सामने पूर्वी दिशा की ओर “ओम पर्वत“ बताया गया जो कि घने कोहरे से ढका हुआ है। इसलिए हम लोग भी दर्शन नहीं कर पाए। हिमालय की इस पहाड़ी में बर्फ जमने के बाद इस प्रकार दिखाई देता है जैसे किसी ने बर्फ से ओम लिख दिया हो।
सेटेलाईट फोन से घर बात की साथ ही डाली, अविनाश व राहूल से भी बात की हिमालय पर्वत की इस घाटी में पता नही क्यों आज सभी लोग याद आए। मुझे लगा कि मैं आज कहां से कहां किनके आशीर्वाद से पहुंच गया हूं।इन लोंगो से बात करते समय गला रूंध आया आंखों में आंसू आ गए, तुरन्त अपने आपको सम्हालने की कोशिश की। फोन के उपयोग हेतु और यात्री आ गए थे, मैं बाहर आ गया।
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आज की ठण्डी एवं कल यात्रा के वक्त पड़ने वाले ठण्डी को देखते हुए और गरम कपड़ा निकाला तथा लगेज पुनः पैक किया। 6.00 बजे शाम को डोम से बाहर निकलकर चाय पी। जैसे-जैसे शाम होते जा रही थी हवा में ठण्डकता एवं तेजी बढ़ती  ही जा रही थी  रात्रि 8.00 बजे सभी यात्रियों के साथ भोजन किया, उसी समय सभी को बता दिया गया कि कल भारत सीमा पार कर चीन सीमा में प्रवेश करना है। चीनी अधिकारियों द्वारा 5.30 बजे सुबह सीमा पार कराने का समय निश्चित किया गया है। इसलिए समय का ध्यान रखते हुए कल पैदल यात्री रात्रि 2.00 बजे तथा घोड़े वाले यात्री रात्रि 3.00 बजे अपनी-अपनी यात्रा प्रारंभ करेंगे तद्नुसार यात्री तैयार रहें। रात्रि 9.30 बजे जनरेटर बंद होने के पूर्व सो गया। आज तेज ठण्डी और ऊंचांई के वजह से हरारत और सिर में दर्द महसूस हुई।

क्रमश: .....

डी.पी.तिवारी,
रायपुर